गीता ज्ञानेश्वरी | Gita Gyaneshwari

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १९ 2आक्कथतकह. एज विदेशी हज कल ७-2 ही ज्ञानेश्वरी के श्रनेक अनुवाद दि विथ भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में हुए हैं, जिनका विवरण विस्तार से प्रकाशकीय वक्तव्य में दिया जा. चुका है । श्यतः यहां केवल प्रस्तुत पद्यानुवाद एवं इसके श्तुवादक के विषय में ही कु प्रकाश डालना शेप है । 'उडेश्ययह एक विशुद्ध प्रासादिक रचना हैं । प्रविप्ण, मान, सादित्यसेवा, लोकोपकार या श्वन्य किसी को मन में रखकर यह कार्य किया गया हो--रऐसी बात नदीं हैं । ज्ञानेश्वरी के श्वन्त में श्री ज्ञानेश्वर ने कहा है कि 'ढोरी की गति के श्वतुसार जैसे कठपुतली चलती है बँसे दी मेरे स्वामी शुरुदेव निवत्तिनाथ ने जैसा कहलाया यद्दी मैंने कद दिया । अन्यथा चमत्कारपूर्ण शब्दरचना कैसे होती है) सिद्धान्त कैसे स्थापित किए जाते हैं, अलंकार किसे कहते दें; इत्यादि बातें में कया जानूं ठीक इसीप्रकार अपनी श्यनन्य अदैतुकी भगवत्मीति हारा भगवान्‌ को श्रपना वनाकर 'अद््निश उसी सायुज्य- सीख्य में निमग्न प्रस्तुत पाजुवाद के रचयिता कविभूपण श्री गणेशप्रसाद श्रग्रवाल को भी-सेरी समक से--यदद नददीं मालूम कि यह कार्य कैसे व्प्रीर क्योंकर हुआ । भगवदिच्छा शरीर सदुशुरु सिद्ध मदात्सा भी शुलाबराव मद्दारान की प्ररेणावश ही '्यापकी निर्मल प्रतिमा इस '्लोर मुद्दी । जीवन परिचयव्यापका जन्म मध्यप्रदेश के मण्डला नामक स्थान में चेशास्व कृप्णा ठूनीया संवत्‌ १६३६ में हुष्मा था | नर्मदा के पुए्य तट पर घसा यदद मगर प्राचीन ऐतिहासिक महत्त्व का रमणीय स्थान हैं । ध्यापके पूर्घेन 'रदू: थायू 'ति उदार, प्रतापी रथा धर्मशील पुरुप थे । 'माज भी मणडला में नर्मदा तट पर श्वनेकदेवालय, घाट तथा नगर का एक मुद्दा दी उनके नाम से प्रसिद्ध दे । '्ापके पिता श्री सेठ भरेलाल जी भी सत्मद्ठ, साघुमेवा निस्य-मैमित्तिक क्मोनुप्ान दारा एक शादी जीवन बिताने वाले सत्पुरुप में ! घर का याताचरण दो पूर्ण सार्विक एवं भक्तिमय बना रदता था । इन्दीं पैकुक संस्कार व्यौर जीव के स्वतन्त्र पूर्वजन्मटत कर्मों को लेकर इस पवित्र और भीमान्‌ कुल में श्वापका जन्म हुआ । पिठूपुर्य, ज्ञान,पिन्ता और सत्यनिधा के कारण दो “मदत” सम्तान के पिता होने का. सौभाग्य किसी को




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