भारत भूमि | Bharat Bhumi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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द द्गारा देश सरस्वती व एक छोटी-्सी नदी रह गई है जो राजपुताने की रेत में ाकर समाप्त हो जाती है। यव उसका पुराना नाम भी लोप हो चला द। उसके निचले भाग को झव लोग घरघर कइते हैं जो इशइत्ती के लिए भी आए है हमारी मांदभूमि की रूप-रसा में इस वाच श्यीर भी बहुत- से परिवर्तन हुए हैं। प्रकृति ने इन्ड योर भी सुन्दर सुडोल गढने की चेष्टा का है। इसके लिए उसे यहाँ की ऊुंड नदियों के मार्ग बदलने पडे हैं । थोडा वहुत परिवर्तन सब भी जारी है। दिमालय का उत्थान अभी रुका नद्दी हे। नदियाँ अब भी मिट्टी ककर का ढेर लाकर पने किनारे की भूमि ऊंची करती जा रही हें । ऋतु की ठीनता मे भी देरफेर हुआ है। सप्तसिपथ शीत अधान था । सर्दी कडी पड़ती थी । दर्पा भी खूर हती थी । इसके मुग्य कारण सवश्य हो सप्तसिघव की सीमा पर के समुद्र थे । उन समुद्री से भाप वनकर प्रह्माडो पर वर्फ जमती थी घर्पा होती थी सौर नदिया समुद्र का रूप धारण करने के लिए तुली रहती थी । पर श्ाज उस प्रदेश म च चातें नद्दी हैं । सप्तसिवव को सीमा पर क समुद्र सूख गए हें। एक योर के समुद्र का स्थान मरुभूमि ने ले लिया है इस कारण वहाँ का ऋतु बदल गई ददे। शव पंजाब मे जाड के दिनों म जैसी कडी सर्दी




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