आत्म - संयम | Aatm Sanyam

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धर्मानन्द - Dharmanand

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स्वामी परमानन्द जी - Swami Parmanand Ji

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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स्व्डर दस गॉसिसरों कर द-कसकरयकककससपकच्करन्सपनडय्ड व द कि अर... बी आत्म-विजय । रह न्वनलिनलवनल अपने खाने, पीने, बोलने, चछने, सोने अपने काय के ऊपर और विश्वाममें सचेत रूपसे अधिकार करना चाहिये । अन्तमें यह हमको अपनी शरीरिक शक्ति को संचय करने में सहायक होगा, और उनको पूर्ण रूप से एकत्रित करेगा, जो इस समय नियन्त्रित न होने से और उचित रूप से काय में लाने के अभावसे फेली हुई हैं । द्वितीयतः हमारी मानसिक शक्तियां अपने अधीन रखी ज्ञानी चाहिये, जो इस समय अनियन्त्रित रूपसे इघर उधर दोड़ती हैं । इस काय में प्रथमतः हमको विचार शक्तिको उन्नत करने का प्रयल करना चाहिये । हमको प्रत्येक बिचार को जो हमारे मनमें उत्पन्न होता है उसका अजुसरण अन्ध विश्वाससे नहीं करना चा- हिये, किन्तु हमको विचार करना चाहिये और इसको पहिचानने- का प्रयत्न करना चाहिये कि कौन वस्तु नाशवान है और कौन अचल है, कौन आवश्यक है, और कौन अनावश्यक है कौन हमारे शरोरके लिये सुखदायीहै और कौन हमारी आत्माके लिये लाभदायक है । इसके पश्चात्‌ अपनी बिचारशक्तिसे जो मार्ग निर्दिष्ट किया गया है उस पर अपना मन स्थिर रखना चाहिये । इस तरह अपने विचारपर पूण रूपसे स्थिर रहनेसे एकाग्र ध्यानकी शक्ति उत्पन्न होती हे, जिसके थविना हम अपने निम्न स्वभावके ऊपर विजय प्राप्त करने की आशा नहीं कर सकते । यह कार्यो कठिन भले हो विदित हो, किन्तु वह प्रत्येक




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