प्राचीन भारतीय पाठ्यचर्या और शिक्षण पद्धति का विश्लेषनात्मक अध्ययन और वर्तमान सन्दर्भ में उनकी प्रासंगिकता | Prachin Bhartiya Pathyacharya Aur Shikshan Paddhati Ka Vishleshnatmak Adhyayn Aur Vartman Sandrbh Me Unki Prasngikat

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Prachin Bhartiya Pathyacharya Aur Shikshan Paddhati Ka Vishleshnatmak Adhyayn Aur Vartman Sandrbh Me Unki Prasngikat  by श्याम नारायण शुक्ल - Shyam Narayan Shukla

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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विवरण होता है| इसमें उन्हीं विषयों एवं अनुभवों को सम्मिलित किया जाता है, जिनका शिक्षण छात्रों के लिये अभीष्ट होता है। प्राचीन सन्दर्भ में इसका अभिप्राय तत्कालीन समय में पढ़ायें जाने वाले धार्मिक एवं लौकिक विषयों से है। पाठद्यचर्या की सामग्री सम्पूर्ण मानव जाति के वैयक्तिक एवं सामूहिक अनुभवों से ग्रहण की जाती है। ये अनुभव आदिकाल से सतत सफलताओं, असफलताओं के फलस्वरूप समाज की परम्पराओं का निर्माण करते है। जब छात्रों के बौद्धिक स्तर तथा शैक्षिक आवश्यकताओं के अनुकूल इस सामाजिक परम्परा से चयन करके कतिपय तत्वों, मूल्यों को व्यवस्थित किया जाता है, तब वह पाठयचर्या कहलाता है| इसमें मानव जाति के संचित अनुभवों की एक राशि रहती है तथा उसमें मानव जाति की सभ्यता का प्रतिनिधित्व एवं प्रतिबिम्ब होता है| प्राचीन शिक्षा में, डा0 राधाकृष्णन के अनुसार '“वेद' मनुष्य के धार्मिक और दार्शनिक विचारों का मानव भाषा में प्रथम परिचय प्रस्तुत करता है। “'विद' धातु से 'वेद' शब्द बना है, जिसका अर्थ ज्ञान है, अर्थात्‌ जिसके द्वारा मनुष्य सभी विधाओं को जानता, प्राप्त करता, विचार करता और विद्वान होता है, वह वेद है । सामान्यतः वेद अनाम ऋषियों के माध्यम से स्फुरित हुये हैं । इनकी संख्या चार है- 1. ऋगवेदः, 2. यजुर्वेद:, 3. सामवेद:, 4. अथर्ववेद: | प्रत्येक वेद के तीन अंग है यथा- 1. संहिता, 2. ब्राह्मण, 3. आरण्यक | षट्दर्शन में, न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदान्त ये छः हैं । उपनिषद जो ज्ञानकाण्ड कहे जाते है, में विशुद्ध दर्शन, अनुभव, विचार हैं | सूत्रों में गौतम, बोधायन, गोमिल, अश्वपलायन और ब्रह्मसूत्र ये पाँच है। ब्रहमसूतर उपनिषद और गीता को वेदान्त कहा गया है। इन तीनों पर भाष्य लिखने वालों को वेदान्ती माना गया है| वेदों का गहन अध्ययन कुछ ही विद्यार्थी करते थे। लौकिक विषयों .. का अध्ययन करने वालों को वेदों को सामान्य ज्ञान करा दिया जाता था। बौद्ध शिक्षा अपने मूल आधारों में ब्राह्मण शिक्षा से विभिन्‍न नहीं थी का इसके शिक्षा केन्द्र भी शान्त वातावरण में शहरी जीवन से दूर होते थे । शिक्षा के केन्द्र जी दि संघ थे। उनमें सासांरिक और धार्मिक दोनों प्रकार की शिक्षा दी जाती थी। इनके... (6)




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