३३ देवताओं का विचार | 33 Devataon Ke Vichaar

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutShripad Damodar Satwalekar
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
2.9 MB
कुल पष्ठ :
35
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
No Information available about श्रीपाद दामोदर सातवळेकर - Shripad Damodar Satwalekar
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)१४ तात्पयं इस प्रकार १ अधि २ इन्द्र ३े बृह- स्पाति ४ सविता ५ अखिनी ६ सोम ७ आप ८ मरुतः इन देवताओंसे भिन्न उक्त तेहत्तीस देव हैं अथवें कां. १०।७१३ ९६३ २७ में स्कंभ अथात् जगदाघार परमात्माके अंदर ३३ देव हैं । ऐसा कहा है इसलिये स्कंभ देवसे उक्त ३३ देवता मिन्न है यह स्पष्ट सिद्ध है । इसीमंत्रके £ क-तम दाब्द्से क£ देवताका ग्रहण किया जाय तो यह भी एक मिन्नदेवता माननी पड़ती है । तथा कः का अर्थ प्रजा- पति है यदि इसी प्रनापति द्वारा ३३ देवताओंके ३३ स्थान बन गये हैं ऐसा माना गया तो इनसे प्रजापति देवता भी अलग माननी पड़ेगी । अर्थात् ९ स्कंभ १० कर ११ प्रजापति इतने देव उक्त ३६ देवताओंसे मिन्न हैं ऐसा मानना पडता है। अंतिम दो देवेंकि विषयमें अमी तक पूर्ण निश्चय नहीं है तथापि शेष ९ देव मिन्न हैं इसमें कोई संदेहही नहीं है । अर्थात् कुल ३३ ही देवताएं हैं ऐसी बात नहीं है। इनसे मिन्न उक्त अग्यादि देव हैं । और घूंडनेपर अधिक भी मिल सकते हैं। वेद भी ३३ देवताओंसे मिन्न कई अधिक देव हैं । इस प्रकार वेदका मंतव्य ३३ देवताओंकि विषयमें देख छिया | अब ब्राह्मण यंथेंमिं इन देवताओंके विषयमें जो उछेख आगयें हैं उनका विचार करेंगे । --
User Reviews
No Reviews | Add Yours...