संगीत शास्त्र [भाग 2 ] | Sangeet Shastra [Part 2]

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Book Image : संगीत शास्त्र [भाग 2 ] - Sangeet Shastra [Part 2]

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(४) श्र द््‌ ३ निषाद का शुर्णातिर न जे न रा ष् झ्् भर - *. निषाद की 'झादौलन संख्या > दश०>६४* न ५० नोट --यदि किसी सर का शुशांतर दिया हो तो पड़ज यी 'भांदोलन संख्या २४० को उससे गुणा करके उस स्वर की श्लादोलने सख्या निकल '्ाती है 1) मध्यकाल के स्पर-स्थान सगीत के इतिहास का मध्यफाल मुख्यतया १४वीं शताब्दी से रद वी शताब्दी तक साना जाता है, जिसके बीच में तीन-चार मुख्य संगीत शास्त्र के सस्कृत अथ लिये गए, इनमें से मुख्य म्रथ “संगीत पारिनात' है जिसे पडित अह्ोवल ने लिया था, इनमें से अथम चारहों शुद्ध और पिकत स्परो के स्थान, चीणा के सार की लंबाइयो की सहायता से निश्चित करके दिये गये हैं । उसके घाद' श्री नियास पढ़ित से भी श्रपने प्रथ “राग तत्वदिवोध' में वार स्परों के स्थान ठीक 'अद्दोयल के ढग पर दिये हैं । श्री निवास का यणुन स्पष्ट होने से, उसी के श्रलुसार मध्य कालीन शुद्ध योर निकत-स्पों के ठीक-कीक स्थान, वीणा के चार की लम्बाइयों द्वारा जीचे थताये जाते हें ! थी निगास ने सर्प-प्रथम यह मान लिया कि चीणा का॥पूरा सुला तार ३६ इच लम्बा है ्ीर उससे पडज् स्वर निकलता ह।* इसके उपयत वह चारी-वारी चारहें। स्त्रराँ के पडटों को चाँधने वा छग बताता दै, जिससे हम उनकी लम्पाइयाँ, निकाल सकते हैं .-- (१) श्री निसस फदता हैं. कि मेर और घुड्च ( 'यर्थान घीणा या मितार के दो छोर, श्वटक श्र जिज ) के चीचो वीय में तार




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