कर्मा ग्रन्थ भाग 1 | Karma Grantha Vol.-i

Karma Grantha   Vol.-i by शांतिलाल भटेवरा जैन - Shantilal Bhatewara Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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५ नही ।+-इसलिये-कर्मवाद के अनुसार यह मानने में कोई आपत्ति नही कि सभी मुक्त जीव ईदवर ही है । केवल विश्वास के बल पर यह कहना कि ईश्वर एक ही होना चाहिये उचित नहीं । सभी आत्मा तात्विक हष्टि से ईदवर ही है। केवल बन्धन के कारण वे छोटे-मोटे जीव रूप में देखे जाते है यह सिद्धांत सभी को अपना ईश्वरत्व प्रकट करने के लिये पूर्ण बल देता है। व्यवहार और परमार्थे सें कमंवाद की उपयोगिता इस लोक से या परलोक से सम्बन्ध रखने वाले किसी काम-मे-जब मनुष्य प्रवृत्ति करता है तब यह तो असम्भव ही है कि उसे किसी न किसी विघ्त का सामना करना न पड़े । सब कामों में सबको थोड़े बहुत प्रमाण मे शारीरिक या मानसिक विघ्न आते ही है। ऐसी दशा में देखा जाता है कि बहुत लोग चचल हो जाते है । घबड़ाकर दूसरों को दूषित ठहराकर उन्हें कोसते है । इस तरह विपत्ति के समय एक तरफ बाहरी दुश्मन बढ़ जाते है दूसरी तरफ बुद्धि अस्थिर होने से अपनी भूल दिखाई नहीं देती । अन्त में मनुष्य व्यग्रता के कारण अपने आरम्भ किये हुये सब कामों को छोड़ बेठता है और प्रयत्न तथा शक्ति के साथ न्याय का भी गला घोटता है । इसलिये उस समय उस मनुष्य के लिये एक ऐसे गुरु की आवश्यकता है जो उसके बुद्धि-नेत्र को स्थिर कर उसे यह देखने में मदद- पहुंचाये कि उपस्थित विघ्त का असली कारण क्या है ? जहां तक- बुद्धिमानों ने विचार किया है यही पता चला है कि ऐसा गुरु कर्म का सिद्धान्त ही है । मनुष्य को यह विर्वात करना चाहिये कि चाहे मैं जान सक्क या नहीं लेकिन मेरे विघ्न का - भीतरी ते व असली कारण मुझमें ही होना चाहिये ।




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