सुदर्शन नाटक | Sudarshan Natak

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(९३) की रा की गेट ऊन और और अर ऑन और अं ऑन उन अं अं अर मे बा टी न घ्रुणा करने लगे हैं शोर श्राप उसे स्वप्न में थी देखने की इच्छा नहीं करते है; क्यो ! मित्र ठीव है न ! सुदशेन--लीजिए ! द्ाप तो झपना ही राग झलापने लगे | मैं कह रहा हूँ, कि तय से ही मेरे हृदय में घोर वेदना हो रही है । देवदर--( श्राध्र्य से ) पे ! वेदना ! ओर हृदय में ! क्यों? क्या उस ने श्राप के ऊपर कुछ आघात किया हे ? श्राप ऐसे सउजन सरल व्यक्ति के हृदय पर ! तब तो चह श्वश्य कोई चड़ी निष्ठुर हृदया ज्ञान पड़ती है, जो उस ने पाप के ठीक हृदय ही पर लब््य किया । कहां ? देखू कोई विशेष चोट तो नहीं श्राई । सुदर्शुन--मित्र! झाप क्यों मेरे हृदय को वेदना को इस प्रकार छधिक सड़का रहे हैं। सचमुच में उस की मनों मोहिनी मूर्ति पर तभी से सुग्थ हो गया हूँ! देवढच--कपा कहा ! झाप सुग्ध हो गए हैँ, उस की उस लय कला पर जिससे उसने श्राप के विट्कुल हृदय पर निशाना लगाया । क्यों न हो अ्राखिर निशाना भी तो श- न्यूक लगा है। तब तो शाप उसे अवश्य कुछ पारितोपक देंगे | सुदशेन--प्रिंप सित्र! शाप मेरी बार्तो को क्यों विनोद




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