आत्म विज्ञान | Atma Vigyan

Atma Vigyan by म. दा. गाडगीळ - M. Da. Gadgil

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(रे निवेदन माएत ये में अध्यास्स लिया का फिपय अत्यन्त प्राचीन है । इसवों मूऊ चेंदों मे और उपनिपदों म पाया जाना है। इस विद्या की जितनी प्रचिन्रता और मद्दानत। मानी रड दे, उतनी दूसरी छिसी विद्या की नहीं । अध्यात्म विज्ञान का प्तिपादन भौर व्यापक रूप से निष्पण, सरहते तथा दस द्रेश की सैकड़ों प्राइत भाषाओं में प्राचीन काल से होता चस आया हैं और वर्तमान काछ तक, यान पोइ ३०/४० साल के पूवे तक, इस विवय का विचार, ऊद्दापोद भर चर्चा, जनता से होती रही है । परन्तु अप दू्ा कुछ त्रिपरीत सी दो गई है । उसकी ओर से, क्या सशिक्षित, कया अशिक्षित, सभी णागों में उदासीनता ही छा गई है | इस दशा वे फारण मी बैसे ही दो चुके है | वास्तव म देखा जाए नो आत्मविधान, तत्त्यद दीन, अध्यार्मचिया इन शब्दों फ॑ उच्ारण मान से हा, ऐस ऊँच सिद्धान्ता की कपना होती दो, जो गम्मीर और सूक्मदर्शी पिचारा से उज्ज्वल और उादोवक हों । परन्तु प्रवचन या ब्रह्म निहपण इन शब्द ऐ, किट पारिमाधिक, शब्दों की भरमार, “ अय॑ घट अय पट अवच्डिलावच्छेदकत्व भाव” इस प्रकार की जोशीली चर्चा, पद बाक्याधा वी खीचातानी, इत्यादि द्य ही आंखों के सामने उठ खड होते हैं, और अन्त में कोइ सफलता या. समन्वय भाव नहीं दिखाई देता ! प्रमाण प्रमेय सम्बन्ध इ्यादि रिपियक जो याद प्रतिबाद होत हैं, उनर्म आधुनिक शिक्षितों को तथ्य दृष्टि पी अपेक्षा काटपनिकंता का ही प्राधा्य दीय पढ़ता दै | इससे सन्देह दोता है, दि कया हमारे दा्निक सिद्धान्त भी वोह के पना प्रमति रूप में 2 रज्जुलप और युर्िरिजत के दुष्टान्त, जो इन निरूपयों म बाहुल्य से दिये जाते हैं, क्या वे ही हमारे सिद्धान्तों पर अपना बदला तो नहीं शुफा रहे हैं! शूइम दृष्टि से विचार फरने पर बह श्रतीत दोता दै कि




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