एक जीनियस की प्रेम कथा | Ek Genius Ki Premkatha

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Ek Genius Ki Premkatha by भैरव प्रसाद गुप्त - bhairav prasad gupt

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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__चढ़ा दो,” अपनी देह की साडी खोलते हुए कुसुम ने वहा था। --तो हो. राजेश ने आखें झुकाकर वहा था--मेरी एव बात पर विश्वास कर लो । ड --वह तो कर चुवी हूँ.--पेट्रीकाट वदलते हुए कुसुम ने कहा था। और भी नाखें झुवाकर राजिश ने कहा था-- बह बात तो अब रद हो गयी न, कुसुम । माजी को तो रात को ही भेज रहा हूं । --अच्छा, तो अब दूसरी वात कौन आ गयी ? कुसुम ने ब्लाउज उतारते हुए कहा था। राजेश ने युकी हुई आखो की वद करते हुए कहां था--मैँ वडा थक गया हूँ । माजी को छोड रात मे ही जाना पडंगा । लगता है. कि जो वक्त हु, उसमे थोडा आराम न कर लिया, तो बीमार पड़ जाऊँगा।. कुसुम, तुम थोडे रुपये दं दो । बल जरूर-ज़रुर तुम्हे वही से लाकर दे दूमा । -मभी हो तुम रुपये लेने चल रह थे,--शरीर पर थी बॉडी का काटा खालते हुए कुसुम ने कहा था--मैं कपडे वदल रही हूँ । दूसरी ओर मुह फेरकर राजेश ने वहा था--तुम कपडे बदल लो, बुसुम । कही टहल आएंगे । लेकिन पसे -मसे तुम कल ज़रूर लौटा दोगे न ?--वॉडी उतारत हुए कुसुम ने पूछा था । “यरूर जरूर, कुसुम । राजेश ने कहा था--वम से कम पैसे के मामले मे ती मैंने तुम्ह कभी शिकायत का मौका नहीं दिया हम ! “तो ठीक है, मैं पस दे दूंगी,--दूसरी बॉडी पहनत हुए बुसुम ने बहा था--उठी, तुम कपड़े बदल लो एठुम बदल लो, ढुसुम,--राजेश न सूखत हुए गले से कहा था--मुये जरा हाथ मुह घोना हू। _. फहकर शजेश औसारे वो ओर के दरवाजि से न निकलकर बैठक से हादर औसारे में निवला था | सारे वी ओर ने दरवाजे क॑ पास एक जीनियस वी प्रेमकथा / 15




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