बिगड़े हुए दिमाग | Bigde Hue Dimag

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Bigde Hue Dimag by भैरव प्रसाद गुप्त - bhairav prasad gupt

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बिगडे हुये दिसाग | | १५ गगन-भेदी नारे लगाते लपटो के उन पुत्ल्लो का अत्था शाला-मा अडकता निकक्ष गया ' टमी तरह एक बार रान्‌ सत्तावन में भी कौस का दिसास चिगडा थाः, सामने शून्य से आँखे टिकाये पिता आप ही बड- बडा उठे--'लस समय उसकी दवा गोरों ऑर देश के गद्दारों की गोलियों ने की थी। अबकी फिर राष्ट्र का दिमाग बिगडा है। देखें इस बार ' ओर बह' एक पागल की तरह अद्रहास कर घटे । गाँव के नोजवानों के साथ धीरेन पूर नौ दिन तक घर न लौटा । घर मे बूढे और बूढियाँ आंखों मे सौफ का सन्नाटा और दिल व दिमाग में भयरर आशकाओं को लिगे विन रत्त बनी प्रतीक्षा मे घरों की चोखट पर बेठी रही । आज खबर आयी कि फलों-फलों थाने जला दिये गये, पुलिस बन्दूर्के फेर फेक कर ऐसे भागी, जरा उनके हाथों से बन्दूके नहीं, कियी ने बिच्छू पकड़ा दिय हों} कल समाचार श्राया कि फरल फलों बीज गोदाम लू लिये गय | ऐसे ही स्देशनो फे जलाने, पटरियो के उखाडने, कलग्टरियो ॐ पने, ओल्ल के दरवाजे तोडने, खजानो के लूटने फी खयर एक-एक करके श्माती राह । आखिर एक दिन यह्‌ भी समाचार आ ही गया कि कलक्टर पकड लिया गया । उससे बाकायदे जिल का चाज ज़िल्ला काने स के सभापति को दे दिया | अब जिला आजाद है | अगरेजी हुकूमत का शव शोलो में जला दिया गया । दसय दिन धीरन का दल विजयोत्लास मे देशप्रेम भरे गाने गाता, क्राजादी के नशे में कूमता हुआ गोव मे वापस आ गया। यूढे-बूढियों को उनकी आजादी की घोषणा से जितनी खुशी नहीं हुई, उतनी अपने लालो के सद्दी-ललामत बापस आ जाने पर




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