भर्तृहरि - शतक | Bhartrihari Shatak

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महाराज भर्तृहरि लगभग 0 विक्रमी संवत के काल के हैं
ये महाराज विक्रमादित्य के बड़े भाई थे और पत्नी के विश्वासघात
के कारण इनमे वैराग्य उत्पन्न हुआ

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१४ भतहरि विरचितमु वहति भुवन अेणा शेष! फल फण कस्थितासू । कमठ पतिना मध्येपू्ठ सदा से विधायेते ॥ तमपि कुरुते क्रोड़ाघीन पयोधिरनादरा । दहह महतां नि: सी मानश्चरित्र विभ्यूतय: ॥ हेड |! चौदद भुवनों को अपने फन पर धारण करनेवाले दोषजी को भी कच्छप अपनी पीठ पर लिये हुए है । परन्तु समुद्र ने छस कच्छप को भी अनादर के साथ दइुकर के आधीन कर दिया | सारांश यह कि श्रेष्ठ पुरुषों के चरित्र भी विचित्र ही दोते हैं । चर पक्तच्छेद! समदमघवन्पुक्त कुलिश, प्रहरेरदूच्छद्वबलददनो द्वार. गुरुभि; । तुषारान्द्र: सूनोरदृइ पिरतारि क्लेश विष, नचासों संपात। पयसि एयसां पत्यु रुचित; ।। 9४ ॥। हिमाचल के पुत्र मेनाक को मद से गवित इन्द्र के चलाये डुप उवालामय चक्र की चोट से मर जाना दत्तम था परन्तु अपने पिता हिमाचल को दुग्बी और संतप्त छोड़ समुद्र की इझारण में जाकर अपना पक्ष बचाना उचित न था । सारांश यद्द कि मनुष्य को अपने पत्र चश में कलक लगा कर तथा अपने परिवार को दुःख में छोड़कर किसी नीय शत्रु की रण में कमी नहीं जाना चाहिये । अपने चंदा गत अधिमान से रहकर मर जाना अच्छा पर किसी की शरण में ज्ञाकर ज्ञान बचाना अच्छा नहीं । यद्चेतन। 5पिपादे: स्पृष्ठ: अज्वलति सवितुरिनिकान्त: । तत्तेजरवी पुरुष; परकूतविक्तं कथे सहते ।) १६ ॥।




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  • P

    at 2019-11-23 01:58:34
    Rated : 10 out of 10 stars.
    "Nice"

    Great job

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