जैन भजन शतक | Jain Bhajan Shatak

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Jain Bhajan Shatak by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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= १५) वनाय गुल कलियां, बनाय गुल कलियाँ, मनावोरी अरि० ॥१1 গানা নজানবা हाव भाव दिखारोी। | जय जय जिनेन्द्र, छुनावों रल ।मेलियां, सुनयो रर मिडिया, सुनाबो रट मिलिया, मनापो | || छम छम छम्‌ छम, नाच नचावो । ताह बजवा, बजि मने मार्या । || जावो मनमया बजावो मनमया मनाय अ।र०॥ ३॥ सुक्ति.विदानन्द्‌ नाटक स्वर । . कर्मा कौ .धूट,. उडी गकि गलियां । | उडाभो गंह्गिलि्या,उ डाओ गल्या, पनवोरी भर०४। अगत प्रभावनाः, [द्या जन बाणा । । ` | पीषो पिलावो, दिखाय छल बलियाँ । এ. ॥ दिखाय छल वलियां, दिखाय॑ छछ वलियां मनावोरी अरि० ॥५॥ २३ | ' । तज़े ॥ सोरठ भधिक स्घरूप रूपका द्विया १ जागा मोल्ञ ॥ | उरे दिषा का है फल मारी तेरे से संश नजागा मार ॥ देक॥ ॥ चोरी झूठ कुशील परिय्रह हिंसा अग विचार । ॥ इनसे दुगेति होवे नकं मे पडे अती बार ॥ १॥ || सरे जीव जान अपनी सम ओर. करणा मन धार। || जकरी हषा तू केर बह तो अप्नी मप निहार ॥२॥, . ||ह हिसा से निषैन निवे नित दुल स अपार. .. . | नयाम तने दिंसक भाव भावते करल पर अकार ॥१॥ _ _




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