अंतर की ओर भाग - १ | Antar Ki Aur (vol. - I)

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Antar Ki Aur (vol. - I) by कमला जैन - Kamala Jainमधुकर - Madhukar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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डर सांघना का सांग सरलता अर कि ७. का. सं एक व्यक्ति दूसरे को अगर कर्ज देता है तो वह; चाहे सग॒ा भाई भी व्यों न हो, पूरी लिखा-पढी किये बिना नही देता । किन्तु गाँवो मे आज भी मनुष्य भ्रत्यत सरल होते हैं । उन्हे शहरों के जैसे कायदे कानूनों की श्रावश्यकता नहीं होती । बडी-बड़ी समस्याएं भी वे अपने गाँव की पंचायतों मे ही सुलभा लेते है । ग्रामीरण व्यवित भशिक्षित अथवा श्रधिक शिक्षित न होते हुए भी आचरण से अत्यत महान्‌ होते है । वहा एक व्यक्ति की बहु-बेटी को सारा गाँव अपनी बहू-बेटी मानता है । किसी कवि ने सदाचार का महत्त्व बताते हुए कहा है कि कोई मनुष्य कितना भी ज्ञानी, वास्त्रो मे पारगत विद्वान, तथा साक्षात्त, बृहस्पति भी क्यो न हो किन्तु श्रगर वह झाचरणहीन है तो उसे धिक्कार है -- मतिमान हुए, घृतिसान हुए, गुणवान हुए बहु खा युर लातें । इतिहास भूगोल, खगोल पढ़े नित न्याय रसायन में कटी रातें । रस पिंगल सुषण भाव मरी, गुण सीख युणी कविता करी घाते । यदि मित्र चरित्र न चारु हुआ, घिवंकार है सब चतुराई की बात । वास्तव मे जिस ज्ञान से चरित्र की प्राप्ति न हो और सरलता को जगह जटिलता श्रौर भ्रहम्‌ भा जाए, वह ज्ञान निष्फल है । घर्मराज युधिष्ठिर का बाहरी श्राचरण श्रौर श्रातरिक भावनाएं कितनी सरल निष्कपट और सच्चाई से भरी हुई थी । उनके लिए दुष्मन व दोस्त मे तनिक भी अतर नहीं था 1 कौरवों त्तथा पाँडवो मे महा-भयानक युद्ध हो रहा था और महाभारत श्रपनी समाप्ति पर लाने को था । जव कौरब्रो को सेना के बड़े-बड़े महारथी काम आ चुके तब दुर्योधन घबराया । विचार करने लगा कि पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचाय, महारथी कण श्रौर मेरे सभी भाई प्रयाण कर चुके ! भ्रब मेरी बारी भ्रा गई है, क्या उपाय करू जिससे में बच जाऊ * बहुत सोचने पर भी उसे कोई उपाय श्रपने बचाव का नही सुझा तो वहू सीधा युधिष्ठिर के पास ही चला गया । उनसे ही दुर्योधन ने श्रपने बचने का उपाय पूछा । , युधिष्ठिर सच्चे व सरल थे । उन्होंने यह जानते हुए भी कि महाभारत का मु और समस्त गृह-कलह का कारण दुर्योधन हो है, उसे सस्नेह श्रपने पास बेठाया, शात किया श्रौर कहा--




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