विनोबा के विचार भाग - 3 | Vinoba Ke Vichar Bhag - 3

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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हम सबका श्रेय श्प्र आखो के सामने दस-पन्द्रह लाख लोगो को भूखो मरते देखा है। हम भोले- भाले लोगो की बात जाने दे, किन्तु मैं तो यह जानना चाहता हू कि राज- सीति के पड़ितो की इस मामले मे क्या राय है ? मै राजनीति के पड़ितो से पुछता हु कि वे अपने राजनीति के तत्वों के आधार पर कहे कि ये लाखो लोग मरे, उसकी जिम्मेदारी इस राजसत्ता पर है या नहीं ? यदि वे इस प्रइन के उत्तर मे हा कहे तो मैं फिर पूछूगा कि तब यदि हमने 'क्विट इडिया' के मत्र का उन्वारण किया तो उससे कहा गलती की ? पिछले तीन वर्षों मे यदि वे यह सिद्ध करके दिखाते कि उस मत्र की आवदइयकता नहीं थी तब भी हस स्वीकार कर लेते कि हमारा मन्र गलत था। परतु भारत के आज तक के शासनकाल मे उन्होंने जो पाप किये या कहे कि उनके हाथो हुए, उनपर पिछले तीन वर्षो की घटनाओ के द्वारा कलश चढा दिया गया है। भारत मे इतनी हत्याए हो जाने पर भी वहा वह एमरी क्या कहता है? “इसके लिए हम जिम्मेदार नही है।” “तब कौन है ?” पूछने पर कहता है--बगाल मे 'प्रावि- न्गल ऑटोनॉमी” है । उसपर इसकी जिम्मेदारी है । प्राविन्दल ऑटोनॉमी यानी क्या * वह हैं प्रान्त के लोगो को मरने की स्वतन्रता । उन्हें वह स्वत- न्रता दी गई है और वे उसका निर्वाह कर रहे है । इस प्रकार वह भला आदमी कहता है। तब इसपर हम रोयें या हँँसे *? इसीलिए हम कहते है कि हमारा मत्र सच्चा था, यह बात अब हजारणुना सिद्ध हो चुकी है। अब उसे छोड़ने की जरूरत नही, बल्कि उसे पूरा करना है । उस मत्र को पूरा कैसे किया जाय , इसपर ठीक तरह से विचार किया जाना चाहिए । नदियो मे वाढ आ जाने पर बहुत-सी अमूल्य मिट्टी किनारे पर जम जाती है । बाढ़ तो जैसी आती है वैसी उतर जाती है, किन्तु यह जमनेवाली मिट्टी बहुत ही कीमती होती है और उसका उपयोग करके अच्छी फसल पैदा की जा सकती है। गगा-जमुना के बीच की दोआव की जमीन बहुत ही उपजाऊ है। उसका कारण बाढ के बाद जमा होनेवाली दोनो नदियों की मिट्टी है। ऐसी मिट्टी को बेकार जाने देना दुर्भाग्य का लक्षण है । उसका उपयोग करने से राष्ट्र का नबनिर्माण होता है और वह




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