प्राचीन भारत | Prachin Bharat

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ३. ) इतिहास में सवच्छन्द विचार करने का श्रवकाश नहीं होता ।. बिना शब्दा- डस्बर के घटनाओं का यधातथ्य वर्णन करना श्रौर प्रमाणपुरश्सर बात कहना ाज-कल के इतिहास लिखने की परिपाटी है । अतएव, कवि ब्पोर चित्र - कार-सरीखे इतिहासकार यथार्थ इतिहास के झनुसन्घान करने में सवेथा 'अशक्त थे। इतिहासकारों की श्रेणी में बकल (00:16) तथा वॉल्टेयर (१ ०1- (8176) दार्शनिक विद्वान थे ।. उन्होंने अपने दार्शनिक विचारों के समर्थन के लिए इतिहास का श्राश्रय लिया ओर उसके उन्हीं तसतरों श्रोर घटनाओं को ग्रहण किया जिनसे उनके माने हुए सिद्धान्तों की पुष्टि होती थी ।. परन्तु उनकी भी इस प्रकार की विचार-रौली दूषित थी ।. इतिहास में घटनाओं के ब्राधार पर ही कोई अनुमान वा सिद्धान्त स्थापित किया जाना चाहिए, न कि श्रपने स््रीकृत सिद्धान्तों की पुष्टि के लिए इतिहास की शरण लेनी चाहिए । अपनी मनमानी कल्पना और तकैना एक चीज़ है ओर इतिहास के अनु- सन्धान श्रोर प्रमाणों द्वारा निश्चित किया हुआ सिद्धान्त दूसरी चीज़ है । इतिहास एक स्वतन्त्र विज्ञान है। उसे दार्शनिक शरीर साहित्यिक सिद्धान्तों से जुदा रखकर उसका श्रभ्यास करना ही श्राज-कल् की वैज्ञानिक रीति है। उसमें यथाधे घटनाओं के हूँढ़ निकालने की बड़ों श्रावश्यकता है । जिन साघनें से उसका ज्ञान प्राप्त होता है, उनकी भअदि से श्रन्त तक झालाचना करने श्रार उन्हें प्रामाणिक सिद्ध करने में तीव्र तकं-बुद्धि श्रपेक्षित इुठा करती है। उसकी खे.ज श्रोर शोध करने के वैज्ञानिक तरीक हैं जिन पर पहले इतिहासकार ज़रा भी ध्यान न देते थे। किन्तु उन्नीसवीं सदी में विज्ञान की उन्नति के साथ-साथ इतिहास में बड़ा भारी कायापलट डुश्ा । इतिहास ने उसके शोध झ्ोर झालाचना करने की शेली बदली । उसके कलेवर की पूत्ति के श्रार झनेक नये साधन ढूँढ़ निकाले गयपे। उसके पढ़ने- लिखने का प्रयोजन कुछ का कुछ हा गया । विज्ञान के व्यापक प्रभाव से मानव-विचार के सिन्न-सिन्न क्षेत्रों में विद्वानों को यधातथ्य ज्ञान प्राप्त करने की प्रबल उत्कण्ठा होने लगी ।. वे प्रत्येक विषय के अन्वेषण तथा विश्लेषण में छग गये । नये ढज्ञ--नई चालठ--से सत्य की खोज शुरू हुई । इतिहास के




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