निरंजनी संप्रदाय और सन्त तुरसीदास निरंजनी | Niranjani Sampraday Aur Sant Turasidas Niranjani

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सत तुरसीदास निरजनी दे रूपमे उदार सत, मुसलमानों और सुफियोंकि सपर्कके परिणामस्वरूप प्राप्त होते हैं। सूफियोमे वे मुसलमान हैं जिनके हृदयमें भारतीय जीवनके प्रति उदार भावना विद्यमान थी । वौद्ध धर्म भी इसी प्रकारके एक मनोवैज्ञानिक तथा आन्तरिक जीवन-सघषका परिणाम था । वर्णाश्रम व्यवस्था वननेके पश्चात्‌ भक्तिमे सकीर्णता मा गयी थी और कुछ उदार दृष्टिवाले शास्त्रीय पद्धतिके विरुद्ध मचल रहे थे। वैदिक कालके कमेंकाण्ड, यज्ञ तथा नियम समाजकों जकड रहे थे । सहिता, ब्राह्मण, उपनिषदो तथा स्मृततियो- के आधारपर मनुष्य पूजापाठ, यज्ञ, जप, बलि तथा वर्णाश्रिम घर्मों तथा नियमोके प्रतिपालनमे कट्टर एवं कठोर हो गये थे । पूजा-पाठ, यज्ञ-जपमे भी प्रतिस्पर्धाकी भावना आ जानेसे जीवन वर्धनमय-सा होने लगा था और मस्तिष्क रूढियोकी गुलामी कबूल कर चुका था । ऐसी दशामे मनुष्यताके उदार व्यवहार तथा सपूर्ण प्राणियोंकि प्रति दया और प्रेमकी भावना विकास नहीं पाती । हम भअपनेको पुण्यशाली बनानेके लिए यज्ञोभे प्राणियोकी आहुति देते हैं, तो हृदय आतरिक रूपसे विद्रोह करता है । इसमें हम पुण्य न करके पाप कमाते है । ऐसे देवी-देवता भी, जो हमारे प्राणियोकी हत्या करनेसे सतुष्ट होते हैं, हमारी श्रद्धाके पात्र नहीं रह सकते । इन सब कारणोसे ही वौद्धघ्म त्कालीन वैदिक कर्सकाडी धर्मकी प्रतिक्रिया-स्त्ररूप उठ खड़ा हुआ और उसने किसी भी देवतापर अपनी श्रद्धा न रखी । व्यापक मानवता ही वौद्ध घ्मेका उपदेश व सदेद है । इस प्रकारके ७८1[र वर्मका प्रभाव जो सब प्राणियोपर दया करनेका उपदेश देता था, वर्णाश्रम धर्मके द्वारा ठुकराये और समाजके पीड़ित वर्ग तथा विदेशियोपर विशेष रूपसे पढ़ा, फकितु रू रूपसे उपस्थित न्ञाह्ाण घर्मको भेद न सका । यहीं वौद्ध घर्मकी धाराके विदेशोन्मुख होनेका एक कारण है । वौद्ध घर्मे राजघर्म हो जानिपर भी भारतीय समाजके मतरमे घुसकर सहानुभूति और स्वागत न पा सका और भिक्षुओं तक ही केद्रित रहा । समाजमे प्रभाव डालनेके लक्ष्यको लेकर यह ताघरिक क्रियाओके रूपमे आया । कितु यह विकसित होकर महायानकी शाखाके परिवर्तित रूप कई एकातिक पथोंके रूपमे ही चला गया गौर घीरे-धीरे ब्नाह्मण घर्मके द्वारा पुन विरोध होनेपर उसकी कायापलट हो गयी । * सिद्धो और नाथ-पथियोकी उपासनाकी क्रियाएँ भी इसीके परिणामस्वरूप है । बैप्णव मौर जात व्मेसे जिस भक्तिका विकास हुआ वह सगुण भक्ति है और इस प्रकारके साघवोंने जिस धर्मको अपनाया वह निर्मुण भक्ति ही थी जिसका [१ हिंदी साहित्यकी भूमिका और मध्ययुगेर साघनाके आाधारपर |]




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