धरती मेरा घर | Dharti Mera Ghar

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Dharti Mera Ghar by रांगेय राघव - Rangeya Raghav

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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२०७ घरती मेरा घर ने स्थान को बहुत ही रमणीक बना रखा था । जब हम लौटे तो मन प्रसच्च था । मास्टर साहब चले गए । दूसरे दिन मैं बाबू रामपरदाद के बारे में सोच रहा था कि सास्टर साहुत्र श्रा गए । बोले चलिएगा । कष्ट होगा बाबू साहब से मैंने झ्ापका जिक्र किया । चाय पर बुलाया है उन्होंने प्रापको । रे मुझे ? प्रौर कया ? म्राप तो तकल्लुफ करते हैं । मास्टर साहव जब पीछे ही पड़ गए तो मुभे होना पड़ा । हम जब्र उनके निवास-स्थान के सिकट पहुंचे मैंने देखा कि खेमे गड़े हुए थे | दो-चार नोकर भी मौजूद थे । पुरा ठाठ था ज़मींदाराना । मास्टर साहब के मुख पर शव एक अजीब भाव झा गया । मैं निश्चित नहीं कर सका कि उनके चेहरे पर रौब था या श्रत्यधिक विनसम्रता थी । सहज कहूं तो वह एक विचित्र गांभीयें था । मैंने देखा बाहर ही एक नौकर वेठा था । द्यायद ऊंघ रहा था । बास्टर साहब ने उसके पास खड़े होकर खांसा लेकिन उसपर जूं भी नहीं रंगी जैसे वह किसी दूसरे ही लोक में था । ग्रो रे मंगल 1 मास्टर साहब ने खी कते हुए पुकारा | न्नदाता मंगल चौंक उठा । कह दे आ गए किससे कह दूं १ फिर आंखें खोलीं श्र बोला अन्नदाता भप्रन्नदाता मंगल भीतर गया तो मास्टर बे कहा श्रगर इसमें नशे की आदत न होती तो बड़ा श्रच्छा ्रादमी होता । पता नहीं इसे कैसे यह झ्रादत लग गई । इस घर का यह बड़ा ही वफादार नौकर है । है भी यहू बड़ा ही पुराना बड़ा घामिक भी है ।




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