रीतिकालीन साहित्य के वैविध्य मे दंपति वाक्य विलास | Reetikalin Sahitya Ke Vaividhya Me Dampati Vakya Vilas

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Reetikalin Sahitya Ke Vaividhya Me Dampati Vakya Vilas by डॉ. चन्द्रभान रावत - Dr. Chandrabhan Rawat

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भिषेष राजन के राजाधिपति; पूथ्वीसिंद सुभूप 1 रजघानी श्रीकृष्णणढ, राजत दुर्ग अनूप 1 गो द्विज पाठक बृत दूद, पाठक अरिदल गाल 1 दिनकर दिनकर-वदय के, पृथ्वो सिह महिपाल । ! यह निश्चित रूप से नहीं कट्ठा जा सकता कि ये दोहे कवि गोपाल के द्वारा रचित है अधवा प्रकाथक-सपादव को रचना है । अन्य प्रतियी में ये दोहे नहीं है, अत इनका गापालराय के द्वारा रचा जाना संदिग्ध है । यदि ये कवि के द्वारा रचे हुए है, तो कृप्णगढ़ वे राजा पृथ्वीसिंह स भी कवि का सबंध स्थापित हो जाता है । किंगनगढ़ में उस समय इस प्रकार के कंविया का सम्मान विशेष था | पर, यदि ववि दा सबंध इस दरवार से होता तो वृन्दावनवाली प्रति में अवश्य ही इसका उल्लेख होता । इस लिए कृप्णगढ़ से कवि का सबंध न मानना ही उचित प्रतीत होता है । इतना अवध्य है कि कवि वा किसी राजा के दरवार से सबध था । यह लगता है कि गोपालराय के पू्वज प्र्णत किसी राजा के दर्रवार से सबद्ध होगे । गोपाल याविं का संबंध उस दरवार से लामससातव का रह गया होगा । यदि किसी राजा के प्रर्णत आशधितत होकर गोपाल अपनी स्वनाएं करते तो कही न कही अश्रयदाता का नाम भी आता वधवृत्ति का निर्वाह करते हुए भी कवि ने अपसो काव्य-सार्धना सभवत स्वतन रहपर ही की । २. कुृतित्व गोपाल कवि को प्रतिभा, अस्थास बोर वश-परम्परा सभी बुछ सिला । इसी विरासत ने उन्दें एक चहूज कवि वना दिया । गोपाल वावि ने दपति बाकय विछास के अतिम भाग में अपनी _--णणाणटाटीािएएए है, दंपति बावय विलास (मुद्रित प्रति) पू ८




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