अग्रगामी | Agargami

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Agargami by कुमारी विला कैथर - Kumari Vila Kaithar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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उतकी बदन एक लम्बी, तगड़ो लड़की थी श्रौर तेजी व मजबूती के साय इस तरह ्रागे वढ़ी चली श्रा रददी थी कि मानों श्रच्छी तरद॒ जानती दो कि उसे कहाँ जाना दे श्रौर श्रागे क्या करना हैं । वदद एक लम्बा, मर्दाना शवरकोट एक जवान सिपाद्ी की शान के साथ पहने हुई थी । उसके सिर पर एक गोल मखमली टोपी थी जिसमें एक मोटा नका बैंघा था । उसका चेहरा गम्भीर श्रौर विचारमग्न था श्रौर उसकी निर्मल नीली आँखें प्रत्यक्षतः कुछ न देखते हुए भी सुदूर पर इस एकाग्रता के साथ टिकी थीं कि मानो उसे कोई ब्यया है । जब्र तक उसके भाई ने उसका कोट पकड़कर न खोंचा वद उसे न देख पाई । एक साथ रुककूर अपने भाई के भीगे चेदरे को पॉछने के लिए वद झुकी । “क्यों, एमिल, मैंने तुम्हें दुकान के श्रन्दर रदने के लिए कहा था, न कित्रादर निकल थाने के लिए १ क्या बात है ??? “परी बिल्ली, दीदी, मेरी बिल्ली । एक श्ादमी ने उसे बादर निकाल दिया श्रौर ए६ कुने ने उसे वढाँ चढ़ा दिया ।”. उसकी तर्जनी डँगली कोट को श्रास्तीन में से निकलकर खंभे पर बैठी दुव्व की मारी ब्रिल्ली की झ्ोर इशारे में उठ गई । “पैंने पदले दी कहा था कि श्रगर तुम इसे श्रपने साथ लाश्रोगे तो कोई-न-कोई मुसीबत ज़रूर दोगी । तुम मु्ते इतना तंग क्यों करते दो, एमिल ? लेकिन नद्दीं, गलती मेरी दी थी ।”” खंमभे के तले पहुँच, दोनों दाथ फेलाकर डसने पुरारा, “बिल्लो, तिल्लो,”” पर बिल्ली सिर्फ म्याऊँ कर श्रीर दुम दिलाकर रद्द गई । *“इस तरह यद्द न उतरेगी । किसी को ऊपर चढ़ना होगा । देखती हूँ शायद काले मिल जाय । शायद वद कुछ कर सके । पर तुम्हें रोना बन्द करना होगा, नहीं तो मैं एक कदम भी न दिलूँ गी । तुम्दारा गुलूबन्द कहाँ गया १? दुकान में दी छोड़ श्राए कया ? खैर, कोई बात नद्दीं । लो, यद्द बाँघे देती हूँ ।*” श्रपने तिर से भूरा रूमाल उतारकर उसने लड़के के गले से शाँघ न टनाधा श्र छा दर ठ मी डततन ने




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