विश्व भारती पत्रिका भाग १० | Visva Bharti Patrika Vol 10

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Visva Bharti Patrika Vol 10  by कालिदास भट्टाचार्य - Kalidas Bhattaharyaडॉ रामसिंह तोमरविश्वरूप बसु - Vishwaroop Basuसुधीरजन दास - Sudheerjan Daasहजारीप्रसाद द्विवेदी - Hajariprasad Dwivedi

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डॉ रामसिंह तोमर

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सुधीरजन दास - Sudheerjan Daas

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हजारी प्रसाद द्विवेदी - Hazari Prasad Dwivedi

हजारीप्रसाद द्विवेदी (19 अगस्त 1907 - 19 मई 1979) हिन्दी निबन्धकार, आलोचक और उपन्यासकार थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म श्रावण शुक्ल एकादशी संवत् 1964 तदनुसार 19 अगस्त 1907 ई० को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के 'आरत दुबे का छपरा', ओझवलिया नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री अनमोल द्विवेदी और माता का नाम श्रीमती ज्योतिष्मती था। इनका परिवार ज्योतिष विद्या के लिए प्रसिद्ध था। इनके पिता पं॰ अनमोल द्विवेदी संस्कृत के प्रकांड पंडित थे। द्विवेदी जी के बचपन का नाम वैद्यनाथ द्विवेदी था।

द्विवेदी जी की प्रारंभिक शिक्षा गाँव के स्कूल में ही हुई। उन्होंने 1920 में वसरियापुर के मिडिल स्कूल स

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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शुज्रात के सुफ्दी कवियों की दिन्दी कविता ११ है लिसमें इन्होंने अपनी भाषा- को 'गूलरी' कहा है। इसके अतिरिक्त इन्होंने एक मसनवी और छिखी है लिसका नाम “तबल्ददनामा' है। मोहम्मद अमीन को बहुत से दककनी बिद्वानां ने बषसनी माना है पर प्रो डार साहब ने इन्हें गुजराती मानते हुए कहा है “मोहम्मद भमीम भफ्नी लबान को साफ़ साफ़ शुजराती कहता है भौर बाज़ खालिस गुजराती मरफान मसलन 'गाम' और 'पोपट' का इस्तेमाल करता है”६। इस संबंध में भमीन का कथन दृष्व्य है: खुनों मतलब भहे अब यू अमीं का । लिखे गुजरी मने यूखुफ ज़ुलेखा ॥ हर एक जागे किस्सा है फारसी में । अभी उसकू ऊतारे गूजरा मैं ॥ के बूज़े हुर कुदाम इसको हकीकत । बडी है गुजरी जगबीच न्यामत ॥ बौतां चालिस सो पर चोदद्द और सौ । हैं लिखियां गोघरे के बीच खुनव्यो ॥ जसाकि इम ऊपर कह भाए हैं, अपनी माषा को गूजरी कहने का रिवाज तो दक्‍्खनी शायरों मैं भी था। कितु देशज प्रयोगों को देखकर भौर गोघरा बतन के उल्ेख के भाधार पर कहा ला सकत। है कि मोहम्मद भमीन गुजरात के होंगे या काफ़ी समय तक गुजरात में रहे दोगे। इनकी भाषा शेली के कुछ भौर उदाइरण देखिये गरव कोई इस जगत में की जियेना । गुरुरी का प्याछा पोजियोना ॥ गरब करनार कू पड़ती है मुश्किल । गरव सो ना फरे जो दोवे माकिल ॥ (गुन्जुल ) जमाने कू तरस आता नहीं रे । किसीफा ये भला चाहता नहीं रे ॥ मे मे ६. देखिये, आराणछाल कृपाराम देसाई सम्मान भर क ( शुज० ) पु० १३३१ ।




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