नयी धारा | Nai Dhara

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Nai Dhara by shree ramvriksh bainipuri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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४. अपना झ्नन्य प्रेम दिखलाते हुए उसपर अपने को न्योछावर करते । लेकिन, उसने सेकड़ों मुखों से यद्दी बात सुनते-सुनते अब पुरुषों के प्रति विश्वास खो दिया था बीमारी एक नहीं दों मतंबे श्राई श्रौर फिर उसने दवाई सुनने से इन्कार कर दी । अब यह यौन-रोग को निराबाध रूप से वितरित कर रही थी, लेकिन तो मी गुड़ के ऊपर टूटनेवाली मक्खियों की तरह पुरुषों की कमी नहीं थी । कुछ उसके स्थायी ग्राइक बन गये थे, और कुछ कभी-कभी आ्राते थे । चकले नगर के श्न्पेरे कोने में होते हैं, और वहाँ बहुत भय भी रहता है, इसलिये आइकों कों ललुक-छिपकर ही पहुँचना पड़ता है। पर, मधुपुरी में रहने के समय उसका दरबार खुला सा चलता । पुलिस बहुत दुर -नददीं रहती थी, कानून भी बाघक था, लेकिन जिस तरह उसकी कुटिया में सस्ती शराब बराबर बिकती रहती, उसी तरह सस्ता रूप भी । मधुपरी में बड़े-बड़े लोग दी झपनी स्त्रियों के साथ श्राते हैं । छोंटेन्मोटे काम करनेवाले, चाहे पद्ाड़ी हों या देशी, सभी अवेले श्रति हैं । रूपी ने श्रपनी कीमत बढ़ान्चढ़ा कर नहीं रक्‍्खी थी, इसलिये भी आइकों को कमो नहीं होती थी । पिछले छ-सात सालों में उसे कितनी दी बार कई .मद्दीनों के लिये अपने गाँव में जाकर रदना पड़ा, जिसका मतलब यही था, कि बीमारी ने उसे व्यवसाय के लायक नहीं रक्खा था ।.. रूपी ऋ्रब २५ से ऊपर की दो गई थी । इधर पाकिस्तान बनने के बाद पंजाब से भागे कितने ही साधारण लोग मधुपरो में भी रोजगार के पीछे या सैर करने के लिये आते थे । जिनमें से कुछ उसके स्थायी श्राइक दी नहीं बन गये, बल्कि व्याद्द का प्रलोमन भी देने लगे । स्त्रियों की जहाँ कमी हो, वहाँ उनका मूल्य बढ़ जाता है । एक तरुण दर्जों उसके यहाँ बराबर श्राने-जाने लगा । उसने जब पहले ब्याह का प्रस्ताव किया, तो रूपी ने इन्कार तो नहीं किया, किन्ठु वह विश्वास नहीं कर सकी । -अब वद्द ज्यादा उतावली हो उठी थी। बीमारी श्र उससे भी ज्यादा जवानी के हाथ से निकलने का भय उसको इमेशा सताया करता था । उस साल की गर्मियों में दर्जी बराबर उसके यहाँ श्राता रहा श्र जाड़ों में नीचे के नगर में जाने के लिये तैयार हों गया । . रूपी फिर उन्हीं नगरों में से एक में गई, जिनके चकलों में वह फेरा लगा चुकी ज्यी। दर्जी ने बड़ी खातिर से रक्खा । उसके घरवाले कुछ मामूली सा विरोध करते रहे, लेकिन वह जानते थे, कि श्रपनी जाति की कन्या को पाने की इमारे पास हैसियत नहीं है, इसलिये उन्होंने भी अपनी मूक सहमति दे दी । रूपी की माँ से जब कोई थूछता, तो वह बड़े तपाक के साथ कहती--ससुराल गईं है ।




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