श्रीमद भगवत गीता रहस्य अथवा कर्मयोग्शास्त्र | Srimad Bhagavad Gita Rahasya Athava Karmayoga-shastra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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५... . 1 अनुवादककी भूमिका श्द विषयकों समझानेके लिये उन सब साधनोंकी सहायता ली गई है कि जो हिंदी साहित्य-संसारमें प्रचलित है फिरभी स्मरण रहे कि यह केवल अनुवादही है - इसमें वह तेज नहीं आ सकता कि जो सूलग्रंथमें है । गीताके संस्कृत श्लोकोंके मराठी अनुवादके विषयमें स्वयं महात्मा तिलकने उपोद्धातमें पृष्ठ ६०० यह लिखा है - स्मरण रहे कि अनुवाद आखिर अनुवादही है । हमने अपने अनुवादमें गीताके सरल खुले और प्रधान अर्थको ले आनेका प्रयत्न किया है सही परंतु संस्कृत शब्दोंमें और विशेषतः भगवानकी प्रेमयुक्त रसीली व्यापक और क्षण- क्षणमें नई रुचि उत्पन्न करानेवाली वाणीमें लक्षणासे अनेक व्यंग्याथ उत्पन्न करनेकी जो सामर्थ्य है उसे ज़राभी न घटा-बढ़ाकर दूसरे शब्दोंमें ज्यों-का-त्यों झलका देना असंभव है. . . ठीक यही बात महात्मा तिलकके ग्रंथके हिंदी अनुवादके विषयमें कही जा सकती है । एक तो विषय तात्विक दूसरे गंभीर और फिर महात्मा तिलककी वह ओजस्विनी व्यापक एवं विकट भाषा कि जिसके सर्मकों ठीक ठीक समझ लेना कोई साधारण वात नहीं है। इन दुहरी-तिहरी कठिनाइयोंके कारण यदि वाक्यरचना कहीं कठिन हो गई हो दुरूह हो गई हो या अशुद्धभी हो गई हो तो उसके लिये सहदय पाठक मुझे क्षमा करें । ऐसे ग्रंथके अनुवादमें किन किन कठिनाइयोंका सामना करना पड़ता है और अपनी स्वतंव्रताका त्यागकर पराधीनताके किन किन नियमोंसे बंध जाना होता है इसका अभव वे सहानुभूतिशील पाठक और लेखकही कर सकते है कि जिन्होंने इस ओर कभी ध्यान दिया हो । राष्ट्रभाषा हिदीको इस बातका अभिमान है कि वह महात्मा तिलकके गीता- रहस्यसंबंधी विचारोंको अनुवाद-रूपमें उस समय पाठकोंको भेंट कर सकी है जब कि और किसीभी भाषाका अनुवाद प्रकाशित नहीं हुआ - यद्यपि दो-एक अनुवाद तैयार थे । इससे आशा है कि हिंदीप्रेमी अवश्य प्रसन्न होंगे । अनुवादका श्रीगणेश जुलाई १९१५ में हुआ था और दिसंवरमें उसकी पूर्ति हुई । जनवरी १९१६ से छपाईका आरंभ हुआ जो जून सन्‌ १९१६ में समाप्त हो गया । इस प्रकार एक वर्षमें यह ग्रंथ तैयार हो पाया । यदि मित्रमंडलीने मेरों पूर्ण सहायता न की होती तो मै इतने समय में इस कामको कभी पुरा न कर सकता | इनमें वैद्य विश्वनाथराव लुखें और श्रीयुत मौलिप्रसादजीका नाम उल्लेख करने- योग्य है । कविवर वा. सैंथिलीशरण गुप्तने कुछ मराठी पद्योंका हिंदी रूपांतर करनेमें अच्छी सहायता दी है इसलिये वे धन्यवादके भागी हैं । श्रीयुत पं. लल्लीप्रसाद पांडेयने जो सहायता की है वह अवर्णनीय एवं अत्यंत प्रशंसाके योग्य है । लेख लिखनेमें हस्तलिखित प्रतिको दुहरानेमें और प्रूफका संशोधन करनेमें आपने दिन-रात कठिन परिश्रम किया है । अधिक क्या कहा जाय घर छोड़कर महीनोंतक आपको इस कामके लिये पुनामें रहना पड़ा है। इस सहायता और उपकारका बदला केवल




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