योगवासिष्ठ भाषा भाग 2 | Yogvasisth Bhasa Vol - 2

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Yogvasisth Bhasa Vol - 2 by खेमराज श्री कृष्णदास - Khemraj Shri Krishnadas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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६ ८९७ आनंदरूप महागंभीर करेंदें अब और भी बोधका कारण अरु अज्ञानरूप . नाश करता इंदुप्रमाण वचन हैं तिनको सुन आत्मसिद्धांत निरंतर शाख्र तुझको कहता हों ॥ हे रामजी वैराग्य अरु अभ्यास अरु तत्त्वका विचार इन करिके संसारसमुद्रको तरता है सम्यक तत्त्वके बोधकारि दुर्बोध निवत हो जाता है तब वासनाका आवेश नष्ट दो जाता है अरु निर्देशख पदकों प्राप्त हो जाता हैं. कैसा पद है देश काल वस्तुके परिच्छेद्ते रहित है सोई ब्रह्म जगतरूप होइकरि स्थित भयाहै अर श्रमकरिके द्वेतकी नाई भासतादै जो सब भावकरिके अवि- च्छिब्न है सर्वत्र ब्रह्म है इसप्रकार मत्स्वरूप जानिकरि शांतिमार्‌ होहु॥ हे रामजी केवल ब्रह्मतत्व अपने आपविषे स्थित हे न कु चित्त दे न अविद्या है न मन है न जीव है यह सब कलना ब्रह्मविषे श्रमकरिके पड़ी फुरती है जो स्पंद फुरणा दृश्य है अरु चित्त हैं सो कढ- नारूप संश्रम है त्रह्नते इतर पदार्थ कोऊ नहीं ॥ हे रामजी स्वर्ग पाताल भूमिविषे सदाशिवते आदि अरु तृणपर्यत जो कछु दृश्य है सो सब है चिद्रपते अन्य कड नहीं उदासीन अरु मित्र बाँधव आदिते लेकारि सब ब्रह्म है जबलग अज्ञानकलनाकारि जगतविषे स्थित- बुद्धि है अरु ब्रह्ममाव नानात्व हैं तबलग चित्तादि कलना होतीं है अरु जबछग देदविषे अहंभाव है अर अनात्मदश्यविषे ममत्व है तबलग चित्तादिक भ्रम होता है जबलग संतजन अरु सच्छास्रों- करि ऊंचे पदको नहीं प्राप्त भया अरु मूखंता श्षीण नहीं भई तबलग चित्तादिक श्रम होता हे ॥ हे रामजी जबंढछग देहामिमान शिथिल- ताको नहीं प्राप्त भया अरु ससारकी भावना नहीं मिटी अरु सम्यक्‌ ज्ञानकरिके स्थिति नहीं पाई जबठग चित्तादिक प्रकट हैं जबलग अज्ञानकरिके अंध है जबलग विषयोंकी आशाके आवेशकारि मूर्छित दे जबलग मोहमूछांते उठा नहीं तबलग चित्तादिक कछना होती है ॥ है रामजी जबलग आशारूपी विषकी गंध हदयरूपी वनविषे होती है तबलग विचाररुपी चकोर तहां नहीं - प्राप्त होता भोगवासना नहीं मिटतीहै जब भोगोंकी आशा मिटजावे अरु सत्य शीत




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