गल्प - गुच्छ २ | Galp - Guchchh 2

Galp  - Guchchh  2 by पं. रूपनारायण पाण्डेय - Pt. Roopnarayan Pandey

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बच्चा | थे नाव नथो, मैदान में एक भी श्रादमी न था । दूसरे किनारे पर, काशी के ऊँचे ऊँचे मकानों पर पड़ रही झस्त हो रहे सूये की झाभा बादल के बीच से देख पड़ी । चारों ओर सन्नाटा था। इसी बीच में बच्चे ने सहसा एक श्रार उँगली उठाकर कहा--'“'चन्न, फू !”? थाड़ी दो दूर पर, पानी श्रार कीचड़ से भरी भ्रूमि पर, एक बड़ा भारी कदस्ब का पेड़ था । उसकी एक निचली डाल में फूल खिले हुए थे। वह बालक उधर दही देखकर उंगली का इशारा कर रहा था । दो चार दिन हुए, रामचरन ने लकड़ी के टुकड़ों में कदम्ब के फूल लगाकर एक छोटी सी गाड़ी बना दी थी । रस्सी बाँध कर उस गाड़ी को खींचने में वह बच्चा ऐसा ,खुश हुआ कि उस दिन रामचरन को लगाम पहन कर घाड़ा नहीं बनना पड़ा । घोड़े से वह एकदम सइंस के पद यर पहुँच गया । कीचड़ मैंकाकर फूल लेने जाने को रामचरन का जी न चाहा । जल्दो से उसने दूसरी श्रार उँगली उठाकर बच्चे को बहलाने की नियत से कहा--“'देखे देखे वद्द--यह देखे च्ड़िया--वह उड़ गई! श्रारी चिड़िया झा झा ।”” इस प्रकार लगातार विचित्र कलरबव करते करते ज़ोर से बह गाड़ी ठेलने लगा । लेकिन झागे चलकर जिसके जज होने की सम्भावना छा उस बच्चे को इस तरह साधारण उपाय से बहलाने की चेष्टा




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