प्रवचन - पीयूष - कलश भाग - 1 | Pravachan - Piyush - Kalash Bhag - 1

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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् प्रवचन-पी यूप-कल दाचोर ने नगर शब्दों में राजा को उत्तर दिया ।उपर्युक्त कहानी से यह सिंद्ध होता है कि मुख मिन से विद्वान शतु अच्छा 1किसी विद्वान का कथन है कि रागी अवगुण नही लखा करता । उसे मित्र के दोप दुष्टिगोचर नही होते झौर दन्नु के गुण दिखाई नह्दी देते । कहा भी है* रागी श्रवयुण नहि लखे, यही जगत की चाल । परतिख्र काला किसन जी, ज्या ने कहे कन्हेया लाल ।”राग श्रौर द्वेप का ग्रपनी तीव्रता पर पहुचना ही मिथ्यात्व है । जैसा कि पहले कहा जा चुका है--राग श्र देष दोनो बन्घन है । रागी को झ्वगुण न दिखने से वन्धन है तो ट्वेपी को गुण न दिखने से भी बन्धन ही है । इसके झति- रिवत ये दोनो रागी झ्ौर ट्वेपी, कमदा अवसुण को गुण श्रौर गुण को श्रवगुण के रूप में देखने लगते हे । यहीं राग श्रौर ढ्रष की तीव्रता है प्ौर इसी कारण ये दोनो मिथ्यात्वी माने जाते है। मिथ्यात्व से झावृत्त मानव-प्रकृति न राग को मिटाना चाहती है श्रौर न दप को । वहुत समभाने पर भी व्यवित्त बन्धन को बन्धन न मानकर उसे श्रपनी प्रतिप्ठा का साघन मानने लगता है । राग श्र ढ्रेप को जव तक महान्‌ पाप एव दुष्काट्य बन्घन नहीं सम भा जाता, तब तक श्रात्मकल्याण कदापि सम्भव नही है । राग श्रौर टेप के बन्धन रस्सी श्र साँकल के बन्धन जैसे नही है । रस्सी श्रौर साँकल के बन्धन तो वहा बन्धन हे । इन चन्धनों से हम पूरे नही वँघ सकते । फिर ये बच्घन तो हमें इन्द्रियो से भी दिखाई दे जाते है । थोडे-से प्रयत्नो के फलस्वरूप बाह्य स्थनो से मुक्ति मिल सकती है किन्तु राग श्रौर द्वेप के वस्घन ऐसे नही हे 1 थे तो आ्रान्तरिक बन्घन है । इन्होंने झात्मा के एक एक प्रदेश को जकड रखा है, बाँध रखा है । श्रात्म प्रदेशों से एकाकार होकर, ये हमे इघर-उबर, नीचे- ऊपर भटकाने का काम करते हे । फिर ये बन्घन हमें वन्धन के रूप में दृष्टि- गोचर भी नहीं हो सकते । इसके लिए तो श्रात्मा की जागृति एव सावधानी ही आवश्यक है । बिना आत्मजागृति के हमें विभिन्‍न दुगतियो में ्रमण करना पडता है एव झसह्य दुख भोगने पड़ते हे । बाह्य बत्धन केंवल शअरद्ममात्र को वाँधते है । उनसे हमारे किसी काम में वाघा नहीं पड़ती । उदाहरण के लिए जब एक हाथ व जाये तो दूसरा हाथ, दोनो हाथ बँघ जायें तो पैर, हाथ, पैर बँघ जायें तो दारीर के श्रन्य भाग मेंह, दाँत आदि अपनी-अपनी क्षमताझो से शरीर को वन्घन से सुवत कर सकते है। यह बाह्य वन्घन इतना हानिकारक नही है। किन्तु राग-द्वेष का वन्धन तो ऐसा बन्धन है जिससे हमारा रोम- रोम बंध जाता है । यहाँ, तक कि राग-दटेष के विरुद्ध हमारे सोचने की झाक्ति भी समाप्त हो जाती है । हमारे मन; बचन श्रौर काय सभी उसमें बँघ जाते




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