अर्हत् प्रवचन | Arhat Pravachan

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Arhat Pravachan by पं. चैनसुखदास - Pt. Chainsukhdas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सूउ यह व्याप्ति नददीं है कि जो श्रनादि हो उसे श्रनन्त भी होना चाहिये-नहदीं तो बीज और चुन की परस्परा कसी समाप्र नट्दीं होगी । यह पहले कहा है कि प्रतिन्ण आत्मा में नये२ कमें आाते रहते हैं । कमंबद्ध श्रात्मा अपने मन, वचन आर काय की क्रिया से ज्ञासाथरणादि आठ कर्म रूप और अ्ौदारिकादि ४ शरीररूप होकर योग्य पुद्दगल स्कन्घों का मरहणु करता रहता है । 'ात्मा में कपाय हो तो यह पुदगलस्कन्व कमंचद्-ात्मा के चिपट जाते हें-ठहरे रहते हूं । कपाय(रागई पं) की तीज्रता शोर मन्दता के अनुसार आत्मा के साथ ठह्डरने की कालमर्यादा कसी का स्थिति बन्ध कहलाता है । कपाय के अनुसार टी वे फल देते हैं यद्दी शनुभव बन्थ या अनुभाग बन्घ कहलाता हैं । योग कर्मो को लाते हैं, आत्मा के साथ उसका सम्बन्ध जोड़ते है । कर्मों में नाना स्वसावों को पैदा करता सी योग का ही कास है । क्स्कन्घों में जो परमारुपुओं की सख्या होती हू, उसका कम ज्यादा होना भी योग देतुक हैं । ये दोनों क्रिय/खे क्रमश: प्रकति बस्ध आर प्रदेश बन्घ कहलाती हैं । कर्मों के भेद और उनके कारण कमें के मुख्य आठ भेद हैँ । ज्ञानावरणीय, दर्शनाबरणशीय, चेर्लीय, मोददनीय, बमायु, नाम, गोत्र, घर 'अन्तराय । जो कर्म ज्ञान को प्रगट न होने दे बहु ज्ञानावरणीय, जो इस्ट्रियों को पदार्थों से ग्रभावास्वित नहीं होने दे बद्द दशनावरणीय, जो सुख दुःख का कारण उपस्थित करे अथवा जिससे सुख दुःख हो बह वेदनीय, जो आत्मरमण न होने दे बह मोहनीय, जो आत्मा को मनुष्य, तियंच, देव और नारक के शरीर में रोक रक्‍खे बद्द ्यायु, जो शरीर की नाना अधस्थाओों आदि का कारण दो वद्द नाम, जिससे ऊँच नीच कइलावे बह गोत्र, और जो आत्मा की शक्ति ादि के प्रकट होने में बिघ्न डाले बहू झस्तराय कम है । संसारी जीब के कौन कौन से काय॑ किस किस कर्म के आम्मव के कारण हैं यह जैन शास्त्रों में विस्तार के साथ बतलाया गथा है । उदाइरणायथ-ज्ञान के प्रकार में बाधा देना, ज्ञान के साधसों को छिन्त-भिन्न करना, प्रशस्त ज्ञान में दूषण लगाना, आवश्यक होने पर भी शपने ज्ञान को प्रगट न करना और दूसरों के ज्ञान को 5कट न होने देना छादि अनेकों कार्य ज्ञानावरणीय कम के आख्रव के कारण हैं । इसी प्रकार अन्य कर्मी के आख्रब के कारणों को भी जानना चाहिये । जो कर्मासव से बचना चाहे वह उन कार्यों से बिरक्त रहे जो किसी भी कर्म के आख्व के कारण हैं ।




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