प्रथ्वी के पुत्र | Prathavi Ke Putar

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Prathavi Ke Putar by अमरचन्द्र - Amarchandra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पृथिवी सूक्त--एक अध्ययन ड यस्पामन्नम कृश्यः संवसूवुः, ३) । दक्षिण के गर्जनशील महासागरों के साथ' हमारी सूमि का उतना हो श्रसिन्न सम्बघ समकना चाहिए जितना कि के पवतो के साथ । 'ये दोनो एक हो घनुष को दो कोटिया है । इसीलिये रमणीय पौराणिक कल्पना मे एक सिरे पर शिव दर, दूसरे पर पावती हैं । धघनुष्कोटि के समीप हो मदोदधि ऋँ।र रत्नाकर के सगम की श्रधिष्टाची देवी पाती कन्याकुमारी के रूप में श्ाज भी तप करती हुई विद्यमान हूं । कुमारिका से हिमालय तक फेले हुए महाद्वीप मे निरंतर परिश्रम करती हुई देश की नदियां जोर महानदिया की योर से सबसे पहले हमारा व्यान जाता है । इस सूक्त मे कवि ने नदियां के संतत विक्रम का श्रत्यन्त उत्साह से वर्णन किया है-- यरप्रामाप- परिचरा, समानीरददोरात्रे श्रप्रमाद क्षरन्ति । सा नो भूमियू रिघारा पयोदुद्दामथों उच्ततु चचंसा॥ ६ “जिसमे यतिर्श/ल व्यापक जल रात-दिन बिना प्रमाद ऑ्रेर आआालत्य- के वह रहे हैं, वह भूमि उन अनेक धाराओं को हमारे लिए दूध से परिणत करे झ।र हमकों वचंस से सीचे ।” कवि की वाणो सत्य है | मेघो से रं।र नदियों से प्राप्त दोने वाले जल खेत। मे खडे हुए घान्य के शरीर या प।घो मे पहुच कर दूघ नस बदल जाते हैं श्रार वह दूध दो गाटा होकर जो; रोहूँ झ।र चावल थे दाना के रुप म जम जाता है। खेतों मे जाकर यदि दम दपने नेत्र से इस चोरसागर को प्रत्यक्ष देखें तो दम विश्वास होगा कि हमारे घनघान्य को द्धिष्टान्री देवी लक्ष्मी इसो क्ोरसागर में बसती है। यही दूध अन्न रूप ते मनुष्यों मे प्रविप्ट दोकर वर्चसू आर तेज को उत्पन्न करता है । कवि की दृष्टि मे पृथ्वों के जल विश्वव्यापी (समानी, €) हैं। द्राकाश स्थित नलो से दो पार्थिव जल जन्म लेते हैं । हिमालय की चोटियां पर उंर्‌ गंगा में उतरने से पूव गया के दिव्य जल श्राकाश में विचरते है । वददा पार्थिव सोमाभाव की लकीरें उनमे नहीं ोतीं । कैदन कह सकता है कि किस प्रकार पृथ्वी पर ्राने से पूर्व द्याकाश में स्थित जल हिमालय के [7 कंलाश के श्रड़ों को कहा-कहां परिक्रमा करते हैं ? भारतीय कवि मंगा के




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