अकबरी दरबार | Akbari Darabar

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
शेयर जरूर करें
Akbari Darabar by रामचन्द्र वर्मा - Ramchandra Verma

एक विचार :

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

रामचन्द्र वर्मा - Ramchandra Verma के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है | जानकारी जोड़ें |

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(देखने के लिए क्लिक करें | click to expand)
(१३ )दिया । एक तो बे दोनों एक ही पेश सीस्तान के रहनेवातो थे, दूसरे वैरमखाँ के समय के पुराने साथी थे ।. जब घृूद्ध हाजी मुहम्मदखाँ को लोग प्रतापी युवक खानजमाँ के सामने लाए, तब दोनों एक दूसरे को देखकर बहुत हसे । दोनों हाथ फैला फैलाकर गले सिले । देर तक बैठकर आपस में रामशे हुए ।. चूद्ध हाजी सुद्दम्मदखाँ ने यह उपाय निकाला कि न तो तुम्हारे मन में किसी प्रकार का छत कपट या लमक- हरामी है श्रोर न किसी पराए बादशाह से यह भगडढ़ा है । तुम यहाँ रहे श्ार अपनी माता को मेरे साथ भेज दा ।. वे सहल में जायँँगी श्रोर बेगम के द्वारा निवेदन करेंगी । बाहर मैं साजूद ही हूँ। सारी बिगड़ी हुइ बात फिर से बल जायगीं। शत्र्रों के किए कुछ भी न हे! सकेगा | श्रब पाठक जरा इस बात पर विचार करें कि झकबर ते जौानपुर में है श्रौर श्रासफखाँ तथा मजनू खाँ कड़ा सानिकपुर: सें. सेनाएँ लिए हुए पड़े हैं। दरवार के नमकहरामा से आसफखाँ से कददलाया कि रानी दुर्गावती के खजानों का हिसाब समभ्साना होगा | चतलाओ, अब हम लेप की कया खिलाओगे; श्रौर चारागढ़ के माल सें से हम लोगों को क्या सेंट दागे । उसे खटका तो पदले से ही था । श्रब यह सँऐसा सुनकर वच्द श्रौर भी घबरा गया । तोगों से उसके सन सें यह संदेह थी उत्पन्न कर दिया कि खानजमाँ के सुकावशे में तुम्ह इस समय सेजना सानों छुम्ददारा सिर ही कट--




User Reviews

अभी इस पुस्तक का कोई भी Review उपलब्ध नहीं है | कृपया अपना Review दें |

अपना Review देने के लिए लॉग इन करें |
आप फेसबुक, गूगल प्लस अथवा ट्विटर के साथ लॉग इन कर सकते हैं | लॉग इन करने के लिए निम्न में से किसी भी आइकॉन पर क्लिक करें :