संवत्सरी | Samvatsari

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Book Image : संवत्सरी  - Samvatsari
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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संवससरी [७...» नागकार्तिक शुक्ला ७जब तक तुम्हारा मासिक और हृदय निंदा और प्रशत्ता को समान रूप में नहीं अहण करता, समझना चाहिए कि तुमने तब तक परमात्मा को पाटिचाना हा नहीं है |है| कर क£ के रेप्रश्ा और निन्दा सुनकर हे और विषाद की उत्पात बुद्धि के विकार के कारण होती है। बुद्धि का यह विकार परमात्मा की प्रार्थना से निश्शेष हो जाता है । '«5८. 56, निज है नि ग्ह न न क्र0 ित दिन पृथ्वी पर॒परतत्रता का आस्तित्र नहीं रहेगा, उस दिन सूर्य, पृथ्वी और समुद्र अपनी-श्रपनी सर्थदा लाग देंगे !है गेट रद नहजो: पुरुष परभन श्र परी से सदव यलपूर्वक वचता रहता है, उत्तका-कोई कुछ भी नहीं विगाइ़ सकता |... तुम्हारे सुपस्कारों को दुस्सेप्कार दवा देते हैं और तुम गफ़लत में पढ़े रहते हो | हृढ़ता के साथ अपने सु्तरकारों की रक्षा करो तो आत्मा की बहुत उच्षति होगी । 1




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