संवत्सरी | Samvatsari

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Samvatsari by पं. शोभाचंद्र जी भारिल्ल - Pt. Shobha Chandra JI Bharilla

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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संवससरी [७ ...» नाग कार्तिक शुक्ला ७ जब तक तुम्हारा मासिक और हृदय निंदा और प्रशत्ता को समान रूप में नहीं अहण करता, समझना चाहिए कि तुमने तब तक परमात्मा को पाटिचाना हा नहीं है | है| कर क£ के रे प्रश्ा और निन्दा सुनकर हे और विषाद की उत्पात बुद्धि के विकार के कारण होती है। बुद्धि का यह विकार परमात्मा की प्रार्थना से निश्शेष हो जाता है । ' «5८. 56, निज है नि ग्ह न न क्र 0 ित दिन पृथ्वी पर॒परतत्रता का आस्तित्र नहीं रहेगा, उस दिन सूर्य, पृथ्वी और समुद्र अपनी-श्रपनी सर्थदा लाग देंगे ! है गेट रद नह जो: पुरुष परभन श्र परी से सदव यलपूर्वक वचता रहता है, उत्तका-कोई कुछ भी नहीं विगाइ़ सकता | ... तुम्हारे सुपस्कारों को दुस्सेप्कार दवा देते हैं और तुम गफ़लत में पढ़े रहते हो | हृढ़ता के साथ अपने सु्तरकारों की रक्षा करो तो आत्मा की बहुत उच्षति होगी । 1




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