देश ब्रतोधोतानाम ५१८ | Deshbratodhotanam Ac 518

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Deshbratodhotanam Ac 518 by श्री दिगम्बर जैन - Shri Digambar Jain

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about श्री दिगम्बर जैन - Shri Digambar Jain

Add Infomation AboutShri Digambar Jain

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
[ ११ ] करना चाहिए । आत्मा प्रभुतासंपन्‍न है; जिसे उसकी प्रमुता का विश्वास नहीं हे और अल्पज्ञता तथा रागद्ठ ष की प्रभुता मानता हो तो उसे भगवान की प्रमुता ज्ञात नहीं होती । गाथा--३ बीज॑ मोश्षतरोईशं भवतरोमिध्यात्वमाहुजिना: । प्राप्तायां दशि तन्मुमुक्षुमिरलं यलो विधेयो बुधे: ॥ संसारे बहुयोनिजालजटिले ऑ्राम्यन कुकर्मावृत : । क प्राणी लभते महत्यपि गते काले हि तां तामिह ॥३े॥ ज्ञान स्वभावी आत्माका पूर्ण विश्वास ही पृण पतित्र मोक्ष द्माका बीज है । आचाये पद्मनंदि कहते हैं कि आत्माकी पूर्ण अमृत आनन्द दशा मोक्षरूपी वृक्ष है; उसका बीज सम्यग्दर्शन है । जैसे आम का बीज उसकी शुठछी ही होती है लेकिन आकफल नहीं होता उसी प्रकार परमानंद दशा; अरागी, वीतरागी; विज्ञान दशाका बीज सम्यग्दर्शन है । राग भाव छोड़कर आत्माकी निर्विकल्प श्रद्धा सम्यक्दशन है। ऐसा सम्यक्दर्शन दोनेके पश्चात्‌ श्राव- कत्व होता है। मोक्षरूपी वृश्षका बीज देव, शास्त्र: गुरुकी कृपा या उनका निमित्त या पुण्य-पाप नहीं दै अपितु सम्यग्दर्शन ही है । स्वयं ही अपना सम्यग्दर्शन प्रकट करे तो देव-गुरु-शास्त्र निभित्त कददलाते हैं । सम्प्रदाय या कुछमें जन्म लेसेसे ही कोई




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now