श्री भक्ति सागर ग्रन्थ | Shree Bhaktisagar Granth

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Shree Bhaktisagar Granth by स्वामी चरणदास जी - Swami Charandas Ji

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रथम पंक्तिरंग महल में श्राव कि० - ए्‌( दे 3भरेरतुम देखो हरि की लीला साधो० ५३४तु सुन हे लंगर वोरी तेरी क्षण क्षण छीजत श्राप ० पर श्राशा है दुखदाईश्३२ कक ५२ रेभाई रे विषम ज्वर जग व्याघि ०४५१८मन में दीरघ भये विकारा५१८मन रोगी भयो पिंग कि कुवुधि० ५१६ वह बैरागी जानिये जाके राग० ५२४समभक रस कोइक पावे हो सब जग भरम भुलाना ऐसे सब सुखदायक हैं हरी मूरख ० साघो निन्दक मित्र हमारा सावोंरी संगत भँवरा दुलंभ ० साघो होनहार की वात सुन सुरत रंगीली हे कि हरि० बसन्त के पद एसे कृष्ण कुंवर खेलत बसंत एसे पारब्रह्म खेलत वसंत खेलो राम नाम ले ले वसन्त. खेलो नित वसंत खेलो नित० 'श्र ५२७ श््र्८ नर श्रर२ भू३० श्देरभरे भ्३६ ५३७ भरेपुष्ठ संख्याप्रथम पंक्ति पुष्ठ संख्यामेरे सतयुरु खेलत निज वसन्त वह देश श्रटपटा विकट पन्थ वह वसन्त रे वह वसन्तसाधो श्रातमं पूजा करें कोंयहोरी के पदश्रादि पुरुष अ्रविगत श्रविनाशी ० ५४९श्३७ श्द्८ श३६ ५३६कासू' खेलें को होरियाँ हो०. ५४२ सोहन चतुर सुजान मेरे घर० ५३९ में तो ह्वाँ खेलूगी जाय जित०' शरद सखीरी तत मत ले संग० पढे साघ चलो चुम संभारी, ज़ग० ५४० साघो बुद्धि विवेक संमारि० ५४३ साघो प्रेम नगर के माहि० ४६ साधों छू घट भमं उठाय होरी० ५४१ हरि पिंव पाइया सखी पूरण० ५४५, हिल मिल होरी खेलि लई०... ५४१ ज्ञान रंग हो हो हो होरी प्र सावन के गीत भागी साथिन हे ! इहि भूले० ५२१ सखी सजनी हे ! तेरो पिया० ५१९ विविध विषय ' कोई जाने संत सुजान, उलटे० ५४७ गुरु दूती बिना सखी, पीव० ४४भक्ति सागर वर्णन ४८-४६ ४




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