श्री वैष्णव कुलभूषण सार संग्रह | Sri Vaishnav Kulbhushan Sar Sangrah

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Sri Vaishnav Kulbhushan Sar Sangrah by खेमराज श्री कृष्णदास - Khemraj Shri Krishnadas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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८ श्रीवष्णवकुलभूषणसारसंग्रह- अन्यदेवस्य दीक्षातों मुक्तिनैंव प्रजायते ॥ वैष्णवीं च विना दीक्षां सुक्तिनैंव च नैव च ॥२५॥ _ अर्थ-जेसे पक कीच से धोनेसे कीचकी निवृत्ति नहीं होती ईैततेसेही संसारकी निवृत्ति याने जन्ममरणसे रहित होना यदस्थ युद्ध करनेसे नहीं होती है ॥ अन्य देवताके मंत्र ठेनेसे मोक्ष नहीं दोसकता है-बार बार कहते हैं कि विना पैष्णव गुरु किये गति नहीं दोसक्ती है॥र४॥ २५ ॥ पुनः- - अवेष्णवोपदिष्टेन मंत्रेण न परा गतिः ॥ . अतश्व विधिना सम्यग्वेष्णवाद्‌ आहयेन्मचुम॥।२६॥ .. महाकुलप्रसतोपि स्वेयज्नेषु दीश्ितः ॥ . सदस्रशाखाध्यायी च न गुरु स्यादवेष्णवः ॥२७॥। मल अर्थ-अविष्णवके उपदेश मंत्रकरके मुक्ति नहीं दोती है इससे विधिपूर्वक वैष्णवसे मंत्र ठेना चाहिये ॥ उत्त् नाहाणकुलमे जन्म लिया होय और सर्व य्तोंमें विधिपरवक दीसित हाय तथा सहस- आाखाओंके सहित सामवेद अध्ययन कियाहोय तौभी अंवेष्णद १ दौव शाक्त गुरु नहीं करना चांहिये हे शिष्य इसी प्रकारसे बहुत माण हैं ॥ २६ ॥ २७॥ और भी श्रीकृष्णचन्द्रजीने श्रीनारदजी से कहा दे यथा अहवैवर्तपुराण क़ृष्णजन्मखण्डके ८ २ वें अध्यायमें असिद्ध है । विष्णुमंत्रो यापकश्च स एव वैष्णवों द्विजः ॥ न्राह्मणो वैष्णवः प्राज्ञो न तस्मात्परः पुमात॥२८॥। वेदोक्तो वा पुराणोक्तस्तत्रोक्नो वा मचुः झुचिः॥ विचारतों ग्रहीत्वा त॑ शैवः शाक्तश्र वैष्णवः ॥२९॥




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