जनरव | Janraw

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रमाकांत - Ramakant

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रामानन्द - Ramanand

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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तूने भाई से ग्रोर मुमसे निभायी, तो मैने भी तुझे अपना ही समझा / बोल, भूठ कहती हूँ * नहीं, गदल । मेने कब कहा । बस यही बात है, देवर ' अरब मेरा यहां कौन है ! मेरा मरद तो मर गा | जीते जी मेने उसकी चाकरी की, उसके नाते उसके सब म्रपनों की चाकरी बजायी । पर जब मालिक ही न रहए, तो काहे को हुडकम्प उठाऊं ! यह लटक, यह बहुएँ ! मै इनकी गूलामी नहीं करूँगी ' पर क्या यह सब तेरी श्रौसाद नही, बावरी । बिल्ली तक श्रपने जायो के लिए सात' घर उलट-फेर करती है, फिर तु तो मागुस हैं| तेरी माया-ममता कहाँ चली गयी * देवर, तेरी कहाँ चली गयी थी, जो तुने फिर ब्याह न किया 1 मु तेरा सहारा था, गदल ' कांग्रर ' भेया तेरा मरा, कारज किया बेटे ने श्रौर फिर जब सब हो गया, तंत्र तू मुक्त रखकर घर नहीं बसा सकता था. ' तूने मुझे पेट के लिए पराई डयोढी लँघवायी । चूल्हा में तब फुूकू, जब मेरा कोई अपना हो । ऐसी बॉदी नही हैं कि मेरी कुहती वज्चे, श्रौरो की विछिया भनके । में तो पेट तब भरूँगी, जब पेंट का मोल कर लूंगी | समभा, देवर ' तूने तो नहीं कहां तब । श्रत कुनबे की नाक पर चोट पड़ी, तब सोचा, जब तेरी गदल को बहुभ्ो मे प्राँखे तरेर कर देखा । थ्ररे, कौन किसी की परवाह करता है गदन ! --डोडी ने भर्राये स्वर से कहा--में डरता था । तो भला क्यो ? गदाल, मैं बुद्ढा हू । छरता था, जग हसेगा । बेटे सोचेंगे, शायद चाचा का ध्रम्मा से पहले ही से नाता था, तभी तो चाचा ने दूसरा ब्याह नहीं किया । गदल, भैया की भी बदनामगी होती ने ? ग्रे, चल रहने दे ! ---गदल ने उत्तर दिया---भेया का बड़ा खयाल (१४




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