दयानन्दमत दर्पण | Dayanandmat Drpan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ही ( शु५ किसी का चाक्य के चाणों से मर्मस्थान मत छेदी । मघुर चाणी से निज्ञ भाशय के समभाभों चुग्दोओं नी ॥६०॥ पराये मांस के खाकर जो तन अपन्ना- बढ़ाता हैं । नरक का .चहद कमातां है न ज्ञीयों के सताशो जी 7 ६१॥ सनातनधघमानलम्बियों से निवेदन ॥ जनेऊ छोड़कर तुमने गा कंठी से वंघवाया । करो उपनयन मथवा नाम शूद्रों में लिखाशो जी ॥ €२ ॥ जो घन बेटी पे लेते हैं निकाला उनका जाती से । हैं यदद भी काम खोटा दी सगाई जो छुड़ामों जी ॥ ६६ ॥ फिरो .हा। पूजते फबरोक्ा क्‍या अज्ञान छाया है । चिंघाद की भादि में दूछदका क्यों खर पर चढ़ाओ जी ॥९४॥ ज्जुए का खेलना छोड़ो जी लेश्याओं से मुंद मोड़ो । खड़ा दुष्कर्म हैं छड़केां से प्रीति मत बढ़ागों जी ॥ ६५ ॥ फरे खर्‌डन तुम्हारा और छक्कर तुम से घन मांगे । उन्हें देदेके तुम चन्दा च्रूथा घन क्यों लुटाओो जी ॥ 8६ ॥ जो रक्षा धर्म की चाही मेरे श्रन्थों का फहइलाओ । नहीं फिर मन में पछ़िताओो कुढ़ों और दुम्ख पाभोजी ॥ ६७0 दयानन्दी गपोड़ों से चचाओं धर्म के अपने ।




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