जैन जागरण के अग्रदूत | Jain Jagran Ke Agradut

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
श्रेणी :
Book Image : जैन जागरण के अग्रदूत  - Jain Jagran Ke Agradut
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about अयोध्याप्रसाद गोयलीय - Ayodhyaprasad Goyaliya

Add Infomation AboutAyodhyaprasad Goyaliya

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
ये ठेदी +वेटी रेखाएंहमारे यहाँ तीर्थ डूरोका प्रामाणिक जीवन-चरि 1, आचायेकि कार्य-कलापकी तालिका नही, जेन-संघके लोकोपयोगी कार्योकी सूची नही; जैन-सम्राटो, सेनानायकों, मन्रियोके बल-पराकम और थासन- प्रणालीका कोई लेखा नहीं, साहित्यिकों एव कथवियोका कोर पश्चिय नहीं । औौर-तो-और, हमारी आँखोके सामने कल-परसों गूजरनेवाली विभूतियोका कहीं उल्लेख नहीं, और ये जो दो-चार बडे-वूढ़ें मौतकी स्ौखरपर खरे है; इनसे भी हमने इनके अनुभवोकों नहीं सुना है, और झायद भविष्यम दस-पाँच पीढीमे जन्म लेकर मर जानेवालों तकके लिए परिचय लिखनेका उत्साह हमारे समाजको नहीं होगा 1प्राचीन इतिहास न सही, जो हमारी आँखोके सामने निरन्तर गजर रहा है, उसे ही यदि हम वटोरकर रख सके, तो शायद इसी बटोरनमें कुछ जवाहरपारे भी आगेकी पीढीके हाय लग जाएँ । इसी दृष्टि से---बीती ताहि विसार दे श्रारेकी सुध लेहिंनीतिके अनुसार सस्मरण लिखनेका डरते-डरते प्रयास किया । डरते- डरते इसलिए कि प्रथम तो में सस्मरण लिखनेंकी कलासे परिल्ित नहीं । दूसरे अत्यन्त सावधानी वरतते हुए भी यत्र-तथ्र आत्म-विज्ञापनकी गर्व-सी माने लगी । नौसिखुआ होनेके कारण इस गन्थकों लिकालनेमे समर्थ न हो सका । तीसरे मेरा परिचय क्षेत्र भी अत्यन्त सकचित गौर सीमित था । फिर भी साहस करके दो-एक संस्मरण, पचोको भेज दिये 1 प्रकाशित होनेपर ये अनसँवरी टेढी-मेढी रेखाएँ भी अपनोकों पसन्द भाई, और उन्हीके भाग्रहपर ये चन्द सस्मरण और लिखें जा सके 1इन सस्मरणोको ज्ञानपीठकी ओरसे पुस्तकाकार प्रकाशित करनेकी चात उठी तो मुक्के स्वय यह प्रयत्न अधूरा और छिललोरापन-सा मालूम देने लगा । “इन्ही महानुभावोके संस्मरण क्यों प्रकाशित किये जायें लमुक-अमुक महानुभावोके सस्मरण भी क्यो न प्रकाशित किये जाये ? ” यह स्वाभाविक प्रश्न उठना लाजिमी था । लोकोदय-ग्रन्यमालाके विद्वानु




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now