श्रीमद भागवतमहापुराण | Srimad Bhagwat Mahapurana
श्रेणी : हिंदू - Hinduism
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
24.12 MB
कुल पष्ठ :
342
श्रेणी :
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लेखकों के बारे में अधिक जानकारी :
महर्षि वेद व्यास - Mahrshi Ved Vyas
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हनुमान प्रसाद पोद्दार - Hanuman Prasad Poddar
He was great saint.He was co-founder Of GEETAPRESS Gorakhpur. Once He got Darshan of a Himalayan saint, who directed him to re stablish vadik sahitya. From that day he worked towards stablish Geeta press.
He was real vaishnava ,Great devoty of Sri Radha Krishna.
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)अ० रे दशम स्कंन्थ १५ न नावायकालयन र वाफकलकललपायनन कल लि यथा था होने पाये । अब उनका मन सहसा प्रसन्नतासे भर गया । ठगे। विद्याथर्यों अप्सराओंके साथ नाचने ठगी ॥६॥ जिस समय भगवान्के आविर्मावका अवसर आया खर्गमें बढ़े-वढ़े देवता और ऋषि-मुनि आनन्दसे भरकर पुष्योंकी देवताओंकी दुन्दुमियोँ अपने-आप बज उठीं ॥ ५ ॥ वर्षा करने छगे# । जे मरे हुए वादल समुद्रके पास किन्नर और गन्धर्व मघुर खरमें गाने ठगे तथा सिंद्र॒ जाकर धीरे-धीरे गजना करने ठगे 1 ॥ ७ | जन्म-गृत्युके और चारण मगवानके मड्छ्मय गु्णोंकी स्तुति करने चक्रसे छुड़ानेवाले जनाद॑नके अवतारका समय था २. खामीके झुमागमनके अवप्रपर जैसे सेवक स्वच्छ वेप-भूपा घारण करते हैं और शान्त हो जाते हैं इसी प्रकार आकाशके सब नक्षत्र ग्रह तारे शान्त एवं निर्मठ हो गये । वक्ता अतिचार और युद्ध छोड़कर श्रीकृष्णका स्वागत करने लगे । नक्षत्र-- मैं देवकीके गर्भतते जन्म ढे रहा हूँ तो रोहिणीके संतोपके छिये कम-से-कम रोहिणी नक्षत्रमें जन्म तो लेना दी चाहिये । अथवा चन्दरवंधर्में जन्म ले रहा हूँ तो चन्द्रमाकी सबसे प्यारी पत्नो रोहिगीमें ही जन्म लेना उचित है। यदद सोचकर भगवानते रोहिणी नक्षत्रमें जन्म दिया । सने--- १. योगी मनका निरोध करते हैं मुमुझु निर्विपय करते हैं और जिज्ञासु बाघ करते हैं । तस्तरज्ञॉंने तो मनका सत्यानादा दी कर दिया । भगवान्के अवतारका समय जानकर उसने सोचा कि अपर तो मैं अपनी पत्नी--इन्द्रियों और विषय --चरालनवच्चे सबके साथ ही भगवानके साथ खेदूँगा । निरोध और याधसे पिण्ड छूटा । इसीसे मन प्रसन्न हो गया | २. निर्मछको ही भगवान् मिलते हैं इसलिये मन निर्मल हो गया | ३. वेसे दाव्द स्पर्श रूप रस गन्धका परित्याग कर देनेपर भगवान् मिलते हैं । अब तो स्वयं भगवान् दी वह सब बनकर आ रहे हैं | लौकिंक आनन्द मी प्रभुमें मिलेगा । यह सोचकर मन प्रसन्न दो गया । ४. वसुदेवके मनमैं निवास करके ये ही भगवान् प्रकट हो रहे हैं। वदद मारी ही जातिका है यद्द सोचकर मन प्रसन्न दो गया । ५. सुमन देवता और झुद्ध मन को सुख देनेके छिये दी भगवानका अवतार दो रहा है । यदद जानकर सुमन प्रसन्न हो गये । ६. संतोर्मि खर्गम॑ं और उपबनमें सुमन शुद्ध मन देवता और पुष्प आनत्दित हो गये । क्यों न दो माधव विष्णु और वतन्त का आगमन जो हो रहा है । भाद्मास-- भद्र अर्थात् कल्याणका देनेब्राद्य है । कृण्णपक्ष ख़य॑ कृणसे सम्बद्ध है । अछ्मी तिथि पक्षके वीचोीच सन्धिस्यलपर पड़ती है। रात्रि योगीजनोंको प्रिय है । निशीध यतियोंका संध्याकाल और सात्रिके दो मार्गोकी सन्धि है । उस समय श्रीकृण्णके आविर्भावक्रा अर्थ है--अज्ञानके घोर अन्धकारमें दिव्य प्रकाश । निशानाथ चन्द्रके वंदामि जन्म लेना है तो निशाके मध्यमागम अवतीर्ण होना उचित भी है । अष्रमीके चन्द्रोदयका समय मी वद्दी है। यदि बदुदेवजी मेरा जातकर्म नहीं कर सकते तो हमारे वंशके आदिपुरुप चन्द्रमा समुद्रस्नान करके अपने कर-किरणोंसे अम्रत्तका वितरण करें । # श्रूषि मुनि और देवता जय अपने सुमनकी वर्षा करनेके लिये मथुराकी ओर दौड़े तय उनका आनन्द भी पीछे छूट गया और उनके पीछे-पीछे दौड़ने छगा । उन्होंने अपने निरोध और वाधसम्बन्धी सारे विचार त्यागकर मनको श्रीकृण्णकी ओर जानेके लिये मुक्त कर दिया उनपर न्योछावर कर दिया | 1 १. मेव समुद्रके पास जाकर मन्द-मन्द गजना करते हुए कहते--जलनिघषे यह तुम्हारे उपदेदा पास आने का फ है कि हमारे पास जल-द्वी-जल हो गया । अब ऐसा कुछ उपदेश करो कि ेसे हुम्हारे भीतर मगवान् रहते हैं वेसे हमारे मीतर भी रहें । २. बादल समुद्रके पास जाते और कहते कि समुद्र तुम्हारे छृदयमें मगवाद् रहते हैं हमें भी उनका दर्गान-प्यार प्रात करता दो | समुद्र उन्हें थोड़ासा जल देकर कद्द देता-अपनी उत्ताल तरज्ञँसे ढकेठ देता-जाओ
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