आखिरी कविता | Aakhiri Kavita

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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माखिरी कविता : उपन्यास ७ ताज-महलकी पुनरावृत्तिके प्रसंगमें रवीन्द्रनाथके भक्त भारकत मुखसे कह उठें, “अच्छी चीज जितनी ज्यादा हो उतना ही अच्छा है।”' अमितने कहा, “ठीक इससे उलटी वात है । विधाताके राज्यमें अच्छी चीज थोड़ी ही होती हैं। इसीसे तो वह अच्छी है। नहीं तो, वहू अपनी ?*ही भीड़के घंक्कोंसे हो जाती मामूली । “”* और, जो कवि साठ-सत्तर वर्ष तक जिन्दा रहनेमें जरा भी लज्जित नहीं होते, वे अपने आपको दण्ड देते हैं अपनेको सस्ता वनाकर । अन्तमें अनूकरणोंका झुंड॒ चारों तरफ व्यूह रचकर उन्हें मुंह विराया करता हैं। फिर उनकी रचनाओंका चरित्र बिगड़ जाता हैं, अपनी पहेलेकी रचनाजोंमेंसे चोरी शुरू करके उनकी रचनाएं हो जाती हैं पूर्व-रचनाओंकी 'रिसीवसे ऑफ स्टोलून्‌ प्रॉपर्टी ' । ऐसी अवस्थामें, लोक-दहतिकी खातिर पाठकोंका यह कतेंव्य है कि इन सब अति-प्रवीण कवियोंको कदापि जीनें ही न देना । गारीरिक जीनेकी वात नहीं कह रहा में, मेरा मत्तलच है उनके काब्यिक जीवनसे । चल्कि, इनकी परमायु लेकर जीते रहें प्रवीण अव्यापक, प्रवीण पॉलिटिशन ( राजनीतिज्ञ ) और प्रवीण समालोचक । उस दिनका एक वक्ता वीच हो में कह उठा, “क्या में जान सकता हूं कि किसे आप प्रेसिडेन्ट वनाना चाहते हैं? कमसे कम उसका नाम तो बताइये 1 ममित चटसे कह वैठा, “निवारण चक्रवर्ती ।” समाकी अनेक क्रसियोंसे जाइचर्य-भरी आवाज गूंज उठी, “निवारण चक्रवर्ती ! है कौन वह ?” “आज जो आपलोगोंके मनमें फकत एक सवालका अंकुर-मात्र बना हुआ है, कल उसीमेंसे जवावका पेड़ जाग उठेगा ।” “जाये उठनेके पहले कमसे कम उसकी करवूतका कोई नमूना भी तो दिखाइये ! ” “तो सुनिये ।”- कहते हुए असितने जेवमेंसे एक पतली लम्बी कैम्चिस की जिल्दवाढी कायी निकाली, और पढ़ना शुरू कर दिया :-- 12-98




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