वृन्दावन विलास | Vrindavan Vilas

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Vrindavan Vilas  by बाबू वृन्दावन दास - Babu Vrandavan Das

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दूषशसशनणथटररकररणण न जीवनचरित्र । कक आरामें आप प्रायः आया जाया करते थे । बहांके बाबू परमेष्टीदास- जीसे आपका विशेष धर्मख्रेद था । उन्हें कवितासे अतिशय प्रेम था 1 अध्यात्मशाक्षोंके ता भी आप खूब थे । इनके विषयमें कविवरने प्रवच- नसारमें लिखा है;--- है... संबत चबौरानूमें सुआाय । आरेतें परमेीसहाय ॥ री अध्यातमरंग पगे प्रवीन। कवितामें सन निशिदिवस छीन ॥ एन सज्नता गुन गरुवे गंभीर । कुछ अग्रवाल सुविज्ञाल धीर पं के... ते मम उपगारी मथम पुर्म | सांचे सरधावी दिएव. अं... मी. आराके बाचू सीमंघरदासजीसे भी आपकी धर्मचचा हुआ करती थी । डा संवत्‌ १८६० में जब कविवर काशीमें आये थे, उस समय वहां जै- नधर्मके श्ञाताओंकी अच्छी शैठी थी । आइतरामजी, सुखलालजी सेढी, ग बकसूरालजी, काशीनाथजी, नन्हूंजी, अनन्तरामजी, मूलचन्दजी, गोकुछ- & चन्दजी, उदयराजजी, गुलाबचन्दजी, भैरवप्रसादजी अग्रवाल, आदि अनेक सल्न धर्मात्माओंके नाम कविवरने अपने भन्थोंकी प्रदास्तिमें दिये पे हैं । इन सबकी सतसंगतिसे हो कविवरको जैनधर्मसे रीति उत्पन्न हुई थी ३ और इन्हींकी प्रेरणासे श्रन्थोंके रचनेका उन्होंने प्रारंभ किया था । बाबू / युखलालजीको तीस चौवीसीपाठकी प्रशस्तिमें कविवरने अपना गुरु ब- 7. तलाया है;-- ! *पकाशीजीसें काशीनाथ मूछचन्द नंतराम, नन्हूंजी गुछाबचन्द प्रेरक प्रमानियो । क सदां घ्मचन्दनन्द शिष्य खुस्खलाखूज़ीको, बून्दावन अग्रवाल गोलंगोती वालियो ॥”” ) बादू उदयराजजी रूमेचूसे कविचरकी अतिशय श्रीति थी । अपने भ्- : न्थोंमें उन्होंने उनका बढ़े आदरसे स्मरण किया है;--- “सीताराम इनीस तात, जसु मादु हुछासरो । शाति छमेचू जनधघर्मकुठ, विदितत प्रकासों ॥ तनु कुछ-कमकू-दिनिंद, झाव मम उद्यराज वर । जध्यातमरस छक्के, मक्त लिंगवरके दिदतर ॥” नकेफ्रिनईखिन नजदीक न जया वाणागााएं ट




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