गाँधी जी पर विचार | Gandhi Ji Par Vitchar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्री चंद्रशंकर परइया को न दिया जाय इस कारण से या. किसी दूसरे कारण से यह श्रालो- चना रमणीयराम नहीं छाप सफ़े । इसमें उन्हें व्यक्तिगत तस्म श्रधिक लगा, यह उन्होंने मुक्ते बताया । दनकी सम्मति के प्रति संपूर्ण सम्मान होने पर भी आज तक मु्ते ऐसा लगा नहीं । थी चन्द्रशंकर स्वभाव से स्ेहशील हैं। इन्हें स्नेह चाहिए भी व्धिक । गुण-दोप-परीक्षा थे श्रच्छी कर सकते हैं। स्वभाव से ही ये एक शच्छे विवेचक हैं। चन्द्रशंकर के सभी मित्रों को इनकी गोप्टी शरीर उसमें चलनेवाली विविध प्रकार की विवेचनाएँ, . गुण-दोप-परीक्षाएँ, व्याख्यान श्रौर इन सबके साथ होनेवाले मीठे विनोद , साथ ही हृदय के भावपूर्ण सत्कार तथा उदारता श्रवश्य याद होंगे | इनमें नागरपन तो नहीं पर नागरिकता है । श्रात्म-सम्माम श्रधिक है । ख्रियों को इनकी मित्रता श्रधिक श्रच्छी लगती है--ऐसा इनके विभय में कहा जाता है। लाड़ इन्हें आवश्यकता से श्रधिक मिला है । लाइ़ले कहे जा सकते हैं या नहीं, यह मालूम नहीं | हमारी ल्रियाँ गीतों में गाती हैं उसके झ्रनुसार किसी टिन थे छुला रहे होंगे ! भले ही ये एक नन्दें से तारे हों पर विशाल व्योम में उनके लिए स्थान है श्रवश्य !




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