भगवान परशुराम | Bhagwan Parshuram
श्रेणी : धार्मिक / Religious

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
10.85 MB
कुल पष्ठ :
404
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)अआसख
््झ्श्रमी विक्रमादित्य के प्रादुर्भाव में पन्द्रह सी चर्प का घिलम्ब था 1
सिकन्दर का श्राक्रमण श्रसी भावी के गर्भ में था--श्रौर उसी प्रकार
ब'रह सौ चर्प श्रोर भी बीतने थे । चुद्ध भगवान् का जन्म होने में श्रभी
*. सह्र वर्ष का विलम्व था; महाभारत के युद्ध के लिए श्रभी फईच्दियाँ वीतनी थीं ।श्राज जो ध्रार्यावते- है चह तब नहीं था । पंजाव उस समय सप्तसिघुता था । श्राज जिस नदी का चिह्न तक श्रवदोप नहीं, उस विद्व्ता
पनी सरस्वती के विशाल तट पर बशिप्ठ, विश्वामित्र, भेसु श्रौर
' श्राधम फंले हुए थे ।
नसिघु में श्रायों की सिरन-भिन्न जातियाँ हंप से प्रेरित होकर
एक-टूसरे से मार-काट करने पर तत्पर हो रही थीं । दो महात्मा एफ-
दु्तरे से वदफर ले रहे पे--एफ थे सिष्ठ, दूसरे दे चिधचािन्र १ चकिप्ठ
थे तृत्सुध्नों के राजा सुदास के गुरु ।दासों के राजा दिवोदास का पुत्र भेद, राजा सुदास के सम्चन्धी की
स्त्री दाशियसी को उड़ा ले गया था । एक दास श्राय राज-फन्या को उठा
ले जाप यह फार्प चशिष्ठ को श्रघर्म जान पड़ा श्रौर भेद पर उग्र प्रकोप
फरके उन्होंने श्रार्यो की एक विशाल सेना खड़ी की ।भेद ने जाकर पुरु्रों के राजा कुत्स की शरण ली । उसने दस
राजाझों का समूह एकचित किया श्रौर घिश्वामित्र नें उनका गुरुपद
स्वोकार किया 1श्राज जहाँ राजपुत्ताना है वहाँ स्थान-स्थान पर सरुस्थल श्रौर पानी
के पोखर फंले हुए थ। जहाँ झाज बंगाल है चहाँ वड़ी-बड़ी नदियों के
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