देव दर्शन | Dev-darshan

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
शेयर जरूर करें
Dev-darshan by हरदयालु सिंह - Hardayalu Singh
लेखक :
पुस्तक का साइज़ :
5 MB
कुल पृष्ठ :
210
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |

यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटी है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं |

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

हरदयालु सिंह - Hardayalu Singh के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है | जानकारी जोड़ें |

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(देखने के लिए क्लिक करें | click to expand)
( ११ )वर घामिति वास 'ढ़ी बरसे, सुसकानि सुधा बनसार 'घनी ? सखियानि के 'आानन-ई्दुछु है झे खियासि की बन्दूसिवार तनीं ।कैसा सुन्दर 'झौंर स्वाभाविक चिन है। सीता की बिदा हो रद्दी है। अपनी अपनी अटोरियां पर खड़ी हुई सिथिएा की खुन्दुरियाँ चरात की लि९ा देख रही हैं। बचिताएँ समान याफार की हैं। उनके मुख-मयझ्का से नेत्र-इन्दीवरों को बन्दूलवार सी बँघी नायूम दोवी है । मदकिवि कालिदास ने भी इस भाव पर रघुवश में लिखा हैःअथ पथि गसयिर्वा कठूप्तरन्ये[पकार्य्ये कतिचिद्चसिपाल: शर्वेरी: सनकलप: |पुरमनिशद्ये।ध्यां सैथिलीद्शनानामू कुचणथित्तभ बात तोचसेर्‌गचानामू ।।यदि कालिदास के श्लोक और देव के ४९ के भाव की पुखना की जाथ ता विदित्त होगा कि देव की रचना में जैसा सौन्दय है, वैसा कालिदास की छर्ति में नहीं है ।इसी प्रकार राभपर्द्र के घन वासानधि सशाप्त करके 'येाध्या में पुनराभभन के समय कौशल्या का वखुंच देव ने किया है कहां न होगा कि देव को जगब्जननी सिधिलानन्द्वी के शत कितनी श्रद्धा थी, यद्यपि नॉस्तव में दंत हरिवश सस्थरदाय के शिष्य होने के कारण वे ब्रजाघीश श्रीकृष्ण चन्द्र 'आन्टूकन्र एव इपसावुनन्द्नी के उपासक थे




User Reviews

अभी इस पुस्तक का कोई भी Review उपलब्ध नहीं है | कृपया अपना Review दें |

अपना Review देने के लिए लॉग इन करें |
आप फेसबुक, गूगल प्लस अथवा ट्विटर के साथ लॉग इन कर सकते हैं | लॉग इन करने के लिए निम्न में से किसी भी आइकॉन पर क्लिक करें :