आनंद प्रवचन भाग 4 | Anand Pravchan Vol 4

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
शेयर जरूर करें
Anand Pravchan Vol 4 by कुन्दन ऋषि - Kundan Rishi

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

कुन्दन ऋषि - Kundan Rishi के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है | जानकारी जोड़ें |

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(देखने के लिए क्लिक करें | click to expand)
तीर्थंकर महावीर फरतीर्थंकर त्याग और वेराग्यपूर्ण साधना करते हुये अपने मन को काषा- यिक विकारों से मुक्त करते हैं तथा ससार की मोह-ममता का परित्याग करके कठिन आम्यतर एवं बाह्य तप करते हुए सत्य की अलौकिक ज्योति प्राप्त कर लेते हैं । दूसरे शब्दों मे केवल ज्ञान की प्राप्ति करते हैं ।तत्पश्चात्‌ वे समार के प्राणियों को धर्मोपदेश देकर उन्हे असत्य के मागे से हटाकर सत्य के मार्ग पर लाते हैं और ससार में शाति का सुखद साम्राज्य स्थापित कर अपने कर्सेव्य का पालन करते है । वें अज्ञानी प्राणियों को सम्यक्‌ ज्ञान का आलोक देते हैं तथा उन्हे भौतिक सुखो की वाल्‍्छा से हटाकर आध्यात्मिक सुखो के अभिलापी बनाते है । इस प्रकार असख्य प्राणियों को पतन से बचाफर वे उत्थान की ओर लाते हैं। ऐसे ही तीर्थकर भगवान महावीर थे ।प्रकृति का नियमअब तक के सृष्टि के इतिहास को देखने पर लगता है कि जव-जब इस पृथ्वी पर होने वाला अत्याचार अपनी सीमा लाघने लगता है, अधमं का साम्राज्य स्थापित्त होने पर धर्म का अस्तित्व डगमगाने लगता है तथा जनता अधमें को ही घर्म मानकर भ्रमपूर्ण ध्मे-रहित क्रियाएं धर्म मानकर करने लगती है, तव कोई न कोई महापुरुप समाज और देश का उत्थान करने, तथा धर्म को उसके सही स्थान पर विभृपित करने के लिये अवश्य जन्म लेता है । भगवत्‌गीता मे भी श्री कृष्ण ने अजुंन से कहा है-- यदा यदा ही धर्मस्प, ग्लानिर्भवति भारत ! अभ्पुत्यानसधर्सस्थ, तदात्सान सुजाम्यहम्‌ ॥। परिच्ाणाय साधघूना, विनाशाय च दुष्क़तामु । धर्मसस्थापनार्थाय सभवामि. युगे... युगे ॥ बर्थात्‌ जव-जव घर्मे की हानि और अधमें पृद्धि होती है तव-तव मैं अव- तार घारण करता हूँ। साधुओ की रक्षा के लिये, पापियों के नाश के लिये और धर्म की स्थापना के लिये मैं युग-युग मे अवतार लेता हू । तो भगवान महावीर के जन्म से पहले भी भारत की तत्कालीन दशा चडी दयनीय थी और भारत-भूमि किसी महापुरुप के अवतार लेने की वडी व्यग्रता से प्रतीक्षा कर रही थी । ठीक उसी समय मगघ की राजघानी वैशाली जिसे कुण्डलपुर भी कहा जाता था, वहाँ के राजा सिद्धार्थ एव रानी त्रिशला




User Reviews

अभी इस पुस्तक का कोई भी Review उपलब्ध नहीं है | कृपया अपना Review दें |

अपना Review देने के लिए लॉग इन करें |
आप फेसबुक, गूगल प्लस अथवा ट्विटर के साथ लॉग इन कर सकते हैं | लॉग इन करने के लिए निम्न में से किसी भी आइकॉन पर क्लिक करें :
Do NOT follow this link or you will be banned from the site!