मानस में रीतितत्व | Manas Me Rititatva

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Book Image : मानस में रीतितत्व  - Manas Me Rititatva

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्४ मानस में रीतितत्त्व हमें इसी सिद्धांत की ओर आऊृष्ट -करता है : सो दासी रघुवीर को समुझे मिथ्या सोपि; 'जड़॒ चेतरनहि ग्रन्थि परि गई; जदपि मृषा छूटत कठिनई आदि इस संबंध में उद्धत किए जा सकते हैं। निर्ुण ब्रह्मा की अपेक्षा सगुण ज्रह्म की उपासना में सुगमता का प्रतिपादन मानस को विदिष्टादवत से दूर ले जाता है; क्योंकि इस प्रकार के स्थलों में निगुण ब्रह्म का वहीं स्वरूप निर्दिष्ट है, जो केवलाइतियों को मान्य है : जि ब्रह्म अज अद्वेत अनुभवगम्य मन पर घ्यावहीं, ते कहह जानहु नाथ हम तव सगुण जस नित गावहीं' निर्गुण पद से निखिल हेय प्रत्यनीक एवम्‌ अचिन्त्यकल्याणगुणगर्णकनिलय ब्रह्म परिलक्षित नहीं होता, अन्यथा ते कहह जानहू नाथ हम तव सगुण जस नित गावहीं' की आवश्यकता न पड़ती । रामानुज सिद्धांत के अनुसार शांकर सिद्धांत सम्मत “निर्गण ब्रह्म में शक्तिग्रह ही संभव नहीं हो तो उसका शाब्दबोध कैसे हो सकता है', यही माना जाता है। मानस के प्रारम्भ से लेकर अंत तक निर्गण शब्द का शांकर वेदान्तसम्मत अर्थ में प्रयोग तथा निर्गुण ब्रह्म से भगवान्‌ राम की एकता का प्रतिपादन भी मानस की दार्दनिक आधारमित्ति को श्री बंकराचार्य प्रतिपादित॑ केवलाद्वेत ही सिद्ध करता है। इन सब बातों के अतिरिक्त मानस की परंपरा भी इसमें प्रमाण मानी जा सकती है: बंभु कीन्ह यह चरित सुहावा । बहुरि कृपा करि उर्माह सुनावा ॥ सोइ शिव कागभुसुंडिहि दौन्हां । रामभगत अधिकारी खीन्हों ॥। तेहि सन जागबलिक मुनि पावा । तिन्हू पुनि भरद्वाज प्रति गावा॥ ..... में पुनि निज गुरु सन सुनी, कथा सो सुकर खेत॥ व समझी नहिं तसि बालपन, तब अति रहेउ॑ अचेत ॥ मानस पर प्रसंग के : न सुठि सुंदर संवाद वर, विरचे बुद्धि. विचारि। तेइ यहि पावन सुभग सर, घाट मनोहर चारि॥. ं इस दोहे के अनुसार मानस के चार संवाद ही चार घाट माने गए हैं। उपयुक्त परम्पर में चारों का संबंध मगवान्‌ शंकर से है। चार संवाद हैं : याज्ञवल्क्य-भरद्वाज-संवाद, दिव-उमा। .. संवाद, कागमुसुण्डि-गरुड़-संवाद तथा गोस्वामी और भक्त जनों कां संवाद । तीन का संबंध त स्पष्ट ही शिव से है, चतुथे गोस्वामीजी मी “गुरु झंकर रूपिणम्‌ के अनुस।र गुरु स्वरूप शंकर र संबंद्ध हैं। स्वयम्‌ की मानस काव्य की रचना-क्षमता भी वे शंगु प्रसाद से ही मानते हैं झंभु प्रसाद सुंमति हिय हुलसी, रामचरित मानस कवि तुलसी। ...... ऐसी स्थिति में शंकर शंकराचायंम' के आधार पर मानस का दादष॑तिक आधार भगवा शंकराचाये सम्मत केवलादरत ही हो सकता है। केवल आपात दृष्टि से ही देखने पर त विक्षिष्टादेत' की ही बातें सानस में उपलब्ध हो जायेंगी : ध ...... परबज्च जीव स्वबदा भगवंता, जीव. अनेक एक श्रीकंता॥ जो सबके रहू ज्ञान एक “रस, ईदवर जीरवाहि भेद कहहूं कस ॥ ताते नाश न॒होइ दास कर, भेद भक्ति बाढ़ विहूंग वर ॥




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