जमाल दोहावली | Jamal Dohawali

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Jamal Dohawali by महावीर - Mahaveer
लेखक :
पुस्तक का साइज़ :
7 MB
कुल पृष्ठ :
79
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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या तन की जूती करूँ, काढ़ .रगाऊँ खाल । पायन से लिपटी रहें, आईँ पोर जमाल ॥ श४ है ' शरीर कीं .खचा- ( चमड़ी ) को . निकाल कर, उसे रंग कर ग्हारे वास्ते जूती बनाकर तुम्हारे पावों में आआठों पहर ( सदा तपटा रहूँ (चरणों में आश्रय पाता रहूँ) यही कामना है॥ 9 ॥ -- '. . शुतर-गिय्यो भहराय के, जब आ पहुंच्यो काल । अल्प सत्य कँ देखिक, जोंगी भयो जमाल ॥ १४ ॥ _ऊँट के समान विशाल शरीर वाला पशु भी काल ( सुत्यु ) आने र हड़बड़ाकर गिर पढ़ता है । इस ग्रकार शरीर की नथरता देखकर घवि जसाल उदासीन हो गया ॥ ह४॥ - ं _ मिले भ्रीत न होत है, सब काह के लाल । बिना मिलें मनमें हरघ, साँची प्रीत जमाल ॥ १६ ॥ है लाल / (प्रिय) मिलने पर तो सभी के सन में प्रेम उपजता है पर सँची प्रीति तो वही कहीं जाबेगी कि जो बिना मिलेही ( स्मृति द्वारा ) आनन्द उत्पन्न करती रहे ॥ 26% कनकलरललललयपनहपपकानतकपयपनिपलसपाकएपपयलण'नरलिनकाणगा भ-पाठांतर--बकरी होस्यूं राजरी, काढ़ रंगावो खाल । पाँयन बिचं लिपटी रहूँ, आ्ाठू पोर जमाल ॥ १४, तअथ स्पष्ट है ( उपयुक्त दोहे का अर्थ देखें ) । ः जमला, तो यूं कह रही काढ़ रंगाऊँ खाल । . तेरे पग कूँ पानही, जूती करूँ जमाल ॥ १५ बा॥ (अर्थ उपर्युक्त दोदे सा ही है )




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