जमाल दोहावली | Jamal Dohawali
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
7 MB
कुल पष्ठ :
79
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)या तन की जूती करूँ, काढ़ .रगाऊँ खाल ।
पायन से लिपटी रहें, आईँ पोर जमाल ॥ श४ है
' शरीर कीं .खचा- ( चमड़ी ) को . निकाल कर, उसे रंग कर
ग्हारे वास्ते जूती बनाकर तुम्हारे पावों में आआठों पहर ( सदा
तपटा रहूँ (चरणों में आश्रय पाता रहूँ) यही कामना है॥ 9 ॥ --
'. . शुतर-गिय्यो भहराय के, जब आ पहुंच्यो काल ।
अल्प सत्य कँ देखिक, जोंगी भयो जमाल ॥ १४ ॥
_ऊँट के समान विशाल शरीर वाला पशु भी काल ( सुत्यु ) आने
र हड़बड़ाकर गिर पढ़ता है । इस ग्रकार शरीर की नथरता देखकर
घवि जसाल उदासीन हो गया ॥ ह४॥ - ं
_ मिले भ्रीत न होत है, सब काह के लाल ।
बिना मिलें मनमें हरघ, साँची प्रीत जमाल ॥ १६ ॥
है लाल / (प्रिय) मिलने पर तो सभी के सन में प्रेम उपजता है
पर सँची प्रीति तो वही कहीं जाबेगी कि जो बिना मिलेही ( स्मृति
द्वारा ) आनन्द उत्पन्न करती रहे ॥ 26% कनकलरललललयपनहपपकानतकपयपनिपलसपाकएपपयलण'नरलिनकाणगा
भ-पाठांतर--बकरी होस्यूं राजरी, काढ़ रंगावो खाल ।
पाँयन बिचं लिपटी रहूँ, आ्ाठू पोर जमाल ॥ १४,
तअथ स्पष्ट है ( उपयुक्त दोहे का अर्थ देखें ) । ः
जमला, तो यूं कह रही काढ़ रंगाऊँ खाल ।
. तेरे पग कूँ पानही, जूती करूँ जमाल ॥ १५ बा॥
(अर्थ उपर्युक्त दोदे सा ही है )
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