पंच यज्ञ - प्रकाश | Panch Yagya Prakash

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Panch Yagya Prakash by बुद्धदेव विद्यालंकार - Buddhdev Vidyalankar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पद्च यज्ञ-प्र काश श्श बदलने वाली इच्छा की धाराएं अथवा ठीक विकह्पें को. कहें तो इच्छा के कण दोते हैं, उन्हें सकजल्प संकरप सम- कहते हैं । बह तो बस्तुत: विकल्प हैं । सना भूल हैं. सडल्प नाम विखरे कर्णों का नहीं किन्तु एक अविच्छिन्न घारा का है । विचार-सात्र जो हमारे इदय में उठते हें संकल्प नहीं कदला सकते । फिर प्रश्न उठता है सडुल्प किस विचार-विशेष का नास है ? सक्ुल्प उस विशेप दृढ़ इच्छा का नाम हैं जिसके लिये किसी ने अपना सम्पूण जीवन अथवा उसका एक सुख्य माग चअपंग कर दिया दो । आज इस प्र कार के भावों का, अभाव ही हमारे सन्ध्या में चित्त न लगने का कारण हैं । वत्त सान युग का सब से वड़ा रोग यह सड्ल्प-द्वीनता है । यह नहीं कि हमारे संकल्प अशिव हैं, किनठु न हमारे संकल्प शिव हैं, न अशिव । हस लोगों के चित्त संकल्प-द्दीन हैं । इसीलिये न्नह्मयज्ञादि किसी यज्ञ में भी हमारा चित्त सहीं लगता । अब हम संक्षेप से संकल्प किस प्रकार सम्पूण वर्णांश्रम मयांदा का मूल है यह दिखाते हैं । योगद्शेन के च्यास-माप्य में त्रह्लचय्य का लक्षण इस श हु 1! । सुरप जौ. मैकार किया है. “'न्रह्मचय्य शुप्तेन्द्रियस्योपस्यस्थ ब्रद्चर्् _. सेयम: 1? अब देखने की वाव है कि यदद 'झर्थ यहाँ किस प्रकार हुआ । न तो नज्रह्म का जो कि दुजेयतस होने के कारण श्थ ्न्थ (31 न दि श्र 71.




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