पंच यज्ञ - प्रकाश | Panch Yagya Prakash
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4 MB
कुल पष्ठ :
206
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)पद्च यज्ञ-प्र काश श्शबदलने वाली इच्छा की धाराएं अथवा ठीक
विकह्पें को. कहें तो इच्छा के कण दोते हैं, उन्हें सकजल्प
संकरप सम- कहते हैं । बह तो बस्तुत: विकल्प हैं ।
सना भूल हैं. सडल्प नाम विखरे कर्णों का नहीं किन्तु एक
अविच्छिन्न घारा का है । विचार-सात्र जो हमारे
इदय में उठते हें संकल्प नहीं कदला सकते । फिर प्रश्न उठता
है सडुल्प किस विचार-विशेष का नास है ?
सक्ुल्प उस विशेप दृढ़ इच्छा का नाम हैं जिसके लिये
किसी ने अपना सम्पूण जीवन अथवा उसका एक सुख्य माग
चअपंग कर दिया दो । आज इस प्र कार के भावों का, अभाव ही
हमारे सन्ध्या में चित्त न लगने का कारण हैं । वत्त सान
युग का सब से वड़ा रोग यह सड्ल्प-द्वीनता है । यह नहीं कि
हमारे संकल्प अशिव हैं, किनठु न हमारे संकल्प शिव हैं, न
अशिव । हस लोगों के चित्त संकल्प-द्दीन हैं । इसीलिये
न्नह्मयज्ञादि किसी यज्ञ में भी हमारा चित्त सहीं लगता । अब
हम संक्षेप से संकल्प किस प्रकार सम्पूण वर्णांश्रम मयांदा का
मूल है यह दिखाते हैं ।
योगद्शेन के च्यास-माप्य में त्रह्लचय्य का लक्षण इसश हु 1! ।सुरप जौ. मैकार किया है. “'न्रह्मचय्य शुप्तेन्द्रियस्योपस्यस्थ
ब्रद्चर्् _. सेयम: 1? अब देखने की वाव है कि यदद 'झर्थयहाँ किस प्रकार हुआ । न तो नज्रह्म का
जो कि दुजेयतस होने के कारणश्थ
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