श्री नारायण गुरु | Shrii Narayan Guru

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धर्मपाल - Dharmpal

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मुर्कोट कुन्नहप्पा - Murkot Kunnahappa

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अध्याय 2 दिक्षा नानू की शिक्षा पाँच वर्ष की आयु में ही प्रारंभ हो गयी थी । उनके गुरू चेम्बाजनती मूता पिल्‍ले जो अपने इलाके के बहुत बड़े विद्वान ज्योतिषाचायें उच्च आदशें सम्पन्न एवं जाने माने सवण थे के द्वारा हुई थी । उन दिनों संस्कृत भाषा का जो कि कभी-कभी ब्राह्मी लिपि में लिखी जाती थी साधारण ज्ञान ही शिक्षा का उद्देइय माना जाता था । नारायण अध्ययन में बहुत कुशाग्र बुद्धि थे। उन्हें एक बार जो कुछ सिखा दिया जाता था वे उसे कभी नहीं भूलते थे । संस्कृत काव्य के आधारभूत अध्ययन के परचात्‌ उस प्राथमिक विद्यालय में उच्च दिक्षा के लिए कोई प्रबंध नहीं था । अत नारायण के मामा अपने भांजे को खाली समय में घर पर ही पढ़ाते रहे । कुदाग्र बुद्धि नारायण को पढ़ाने का अपना ही आनंद था। क्ष्ण वाडियार उनको बालप्रौढ़ता से प्राय चकित रह जाते थे। नान्‌ को उच्च शिक्षा दिलवाने के लिए न तो आसपास कोई विद्यालय ही था और न ही उसे दूर गरुकुल में भजना भी संभव था क्योंकि वह बहुत छोटा था । ग्वाला अतः नारायण ग्वाला बन गया । वह नजदीक के पहाड़ों और जंगलों में अपने एकाकीपनका आनन्द लेते रहता और उसकी गायें आराम से इधर-उधर चरतीं और विश्वाम करती रहसी । विचारों में खोया यह ग्वाला काजू के पेड़ों पर बेठकर सीखे हुए इलोकों का पाठ करता रहता और उनके अथों को जीवन में खोजता रहता इसे बीच मामा कृष्ण वाइयार द्वारा घर पर उसकी शिक्षा निविघ्न चलतों




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