जैन ग्रंथावली भाग - 3 | Jain Pathawali (Vol - III)

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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जैन पाठावली ) ः (११ मूल . अर्थ पंचण्हूं अणुव्वयाणं- पाच 'अणुब्रतों का तिण्हूं गुणव्वयाण- तीन 'गुणब्रतो का चउण्ह सिवखावयाणं- चार 'दिक्ष'ब्रतो का वारसचिहस्स सावगधस्मरस- बारह 'प्रकार के श्रावकघमं का १ अणुन्रत अर्थात्‌ छोटे ब्रत । साधुओ के ब्रत महाब्रत कहलाते हैं, क्योकि उनमें हिंसा, असत्य आदि पापों की, किसी भी प्रकार की छूट नहीं रहती-हिसा आदि का जीवनपर्येन्त पूर्ण रूप से त्याग किया जाता है । मगर श्रावक-श्राविकाओ के ब्रत एकदेशीय है, उनमे पापों का स्वेथा त्याग नही किन्तु मर्यादित त्याग किया जाता है । २ वारह ब्रतो में से ६-७-८वाँ ब्रत तो गुणब्रत कहलाता है। ३ वारह न्रतो में से ६-१०-११-१२ वाँ ये चार शिक्षात्रत कहलाते हैं । ४ वारह ब्रतो के नाम- (४) प्राणातिपातविरमण ब्रत-हिंसा काः त्याग करना । (२) मृपावाद . ,; - असत्य का ,/ (३) अदत्तादान ,» -चोरी का. ,, (४) मैथुन +मथुन सेवन का,, (ब्रह्मचर्य पाछना ) (५) पर्म्रिहपरिमाणब्रत-परिग्रह की मर्यादा वरना । (६) दिक्परिमाणब्रत- दिशाओ में आने जाने की मर्यादा करना । (७) उपभोग-परिभोगपरिमाणब्रत-एक वार उपयोग में आने चाली तथा घारवार उपयोग




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