जैन्तत्वमीमांसा | Jaintatvamimansa

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Jaintatvamimansa by फूलचंद्र सिध्दान्तशास्त्री - Fulchandra Sidhdant Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १९ ) प्रत्येक कार्यका उपादान श्रनन्तर पूर्व पर्याय विशिष्ट द्रव्य होता है श्रतएव : श्रगले समयमें कार्य भी उसीके श्रनुरूप होगा । कार्यकी उत्पत्तिके समग्र निमित्त उसे ्रस्यथा नहीं परिणमा सकेगा, इसलिए जो उपादानकी श्रपेक्षा कथन हू वह यथार्थ है श्रौर जो निमित्तकी श्रपेक्षा कथन है वह यथार्थ तो नहीं है परन्तु वहाँ पर निमित्त क्या है यह दिखलानेके लिए वैसा कथन किया गया है । भ्रतएव ऐसे स्थलॉपर भी जहाँ जिस श्रपेक्षासे कथन हो उसे समभककर वस्तुको स्वीकार करना चाहिए । 1 इसी प्रकार श्रौर भी वहुतसे विषय हैं जिनमें वस्तुका निर्णय करते समय श्रौर उनका व्याख्यान करते समय विचारकी श्रावश्यकता है । हमें प्रसन्तता है कि “जैनतत्त्वमीमांसा' ग्रत्थमें परिडतजीनें उन सब विषयोंका समावेश कर लिया हैं जिनमें तत्वजिज्ञासुग्रोंकी दृष्टि स्पष्ट होनेकी श्रावश्य- कता है । इस दृष्टिसि यह पुस्तक बहुत ही उपयोगी बन गई है । इसकी लेखनशैली सरल, सुस्पष्ट श्रौर सुवोध है । परिडतजी के इस समय्रोपयोगी सांस्कृतिक साहित्यिक सेवाकी जितनी प्रशंसा की जाय थोड़ी है। हमें विश्वास है कि समाज इससे लाभ उठाकर श्रपनी ज्ञानवृद्धि करेगी । जैन शिक्षा संस्था | जगन्मोहदनलाल शास्त्री कटनी




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