भरत और भारत | Bharat Aur Bhaarat

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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र भरत भर भारत भ्रसदृदसि का प्रदद ही नहीं उठता या । किन्तु, उनके जीवमकाल में ही भीभ- भूमि समाप्त हो गयी । कल्पबुक्ष नि.कषेषप्राय: हो गये । कमेंमूमि का आरेम्स हुमा 1 नये प्रश्न थे, सये हल चाहिए थे । मासिराय ने चंय-पूर्वक सनका समाधान दिया । ये स्वय श्राण-सह बने । उन्हें क्षत्रिय कहां गया । 'क्जियरना- णसहू:' उन पर बरिताथ होता था । भागे चल कर क्षत्रिय शब्द नाभि' अरब में रूढ़ हो गया । झमर कोषकार ने “क्षत्रिये नाभि: लिख कर सन्तोष किया ।' प्राचार्य हेमचन्द्र ने भी 'प्नमिधात चिस्तामणि' में 'नाशभिवच क्षत्रिये' लिखा है ।' उन्होंने ध्रपने पुरुषर्थ से सद्युग को जन्म दिया 1 प्रजा सुखी बनी भर भोगमुमि के समान ही उसे सबंविध सुविधाएँ प्राप्त हुई । महाराजा माभिराय स्वयं कल्पवक्ष हो गये । भगवज्जिनसेनाचार्य ने महापुराण में लिखा है, “चन्द्र के समान वे भनेक कलाझओओ की झाधारभुमि ये, सूये के समात तेजवान थे, इन्द्र के समान बैभवसम्पस्त थे भौर कल्पवृुक्ष के समान मनो- वांछित फलों के प्रदाता थे ।*” उन्होंने युग-प्रबतन किया । श्राल कल की मोटी परतें भी उनके नाम को नामझेष नहीं कर सकी । वे उसके (काल) वक्ष पर तप्तशलाका से स्पष्ट लिखे रहे, रज.कणो मे अभ्ञक-पत्र से, दिशाश्रो में सू्-से झौर भ्राकाश में धव नक्षत्र से दमकते रहे । कोई मिटा भ सका । वे जीवित हैं, केवल वंदिकों में नहीं, झपितु मुसलमानों मे भी । भरबी का एक शब्द है ग्तबी', जिसका भय होता है--'ईइवर का दूत' , 'पंगम्बर' भौर “रसूल ।' बह शब्द सस्कृत के नामि' शभ्रौर प्राकृत के 'णासि' का हो रूपान्तर-मात्र है ! इसका झथं है कि उनका नाम बना ही नहीं रहा, अपितु 'ईश्वर के दूत' के रूप मे धौर भी चमकीला बना । उनके नाम पर ही इस प्रायखण्ड को नाभि खण्ड था झजनाभवष कहा गया । नाशि को झजनाभ भी कहते थे । स्कन्दपुराण मे, “हिसाद्िजलघेरन्त- अर ''नामिश्च तम्नामिनिकर्तनेम प्रनासमाश्वासन देतुरासीत्‌ 1?” “मददापुराण, ३1२१७. १. अमरकोष, ३1४५1२०. २. अधभिधान चितामणि, १३६. ३. शशीव से कलाधार: तेजस्वी मानुमासिव । प्रभु शक्र इवामीष्ट फलद: कल्पशाखिवतु मद्दापुराण , १२1१ १ ४. 'उदू “हिन्दी कोश”, रामचन्द्र बमी सम्पादित, बिंन्दीअन्यरत्माकर कार्यालय, बग्नई, चतुथ संस्करण, अगस्त १४४३, पृष्ठ २२४,




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